
धर्म परिवर्तन के बाद होने वाली सांप्रदायिकता को रोकने के लिए सरकार सख्त हो गई है। अब विदेशी फंड हासिल करने वाले गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के सभी सदस्यों और पदाधिकारियों को सरकार के समक्ष यह घोषित करना होगा कि वे कभी किसी व्यक्ति के धर्मातरण में शामिल नहीं रहे हैं। गृह मंत्रालय ने सोमवार को यह जानकारी दी। अधिसूचना में मंत्रालय ने विदेशी चंदा (नियमन) कानून (एफसीआरए) में बदलाव की घोषणा की है। इसके तहत अब एक लाख रुपये तक के निजी उपहार प्राप्त करने वालों के लिए सरकार को इस आशय की सूचना देना जरूरी नहीं होगा। पहले यह राशि 25 हजार रुपये निर्धारित की गई थी।

एनजीओ के सभी सदस्य को देना होगा प्रमाण
मंत्रालय के मुताबिक, एनजीओ के प्रत्येक अहम सदस्य और पदाधिकारी को यह प्रमाणपत्र देना होगा कि उसे किसी के धर्मातरण के लिए न तो सजा सुनाई गई है और न ही दोषी ठहराया गया है। इसके पहले एफसीआरए 2010 के अनुसार केवल एनजीओ के निदेशक पद के लिए आवेदन करने वालों के लिए इस तरह का प्रमाणपत्र देना अनिवार्य था।
धर्मातरण के जरिये फैलने वाले तनाव पर अंकुश लगाने का मकसद
मंत्रालय ने यह कदम धर्मातरण जैसे कार्यो के जरिये सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वालों पर अंकुश लगाने के लिए उठाया है। इसके साथ ही एनजीओ के पदाधिकारियों और सदस्यों को यह शपथपत्र भी देना होगा कि वे विदेशी चंदे के दुरुपयोग अथवा राष्ट्रद्रोह और हिंसा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों में शामिल नहीं रहे हैं। पहले इस आशय का शपथपत्र केवल एनजीओ के लिए आवेदन करने वाले को देना होता था।
विदेश में इलाज कराने के लिए देनी होगी जानकारी
एफसीआरए में बदलाव के मुताबिक अगर किसी व्यक्ति को विदेश यात्रा के दौरान आपात स्थिति में इलाज की जरूरत होती है और वह किसी से विदेशी मदद प्राप्त करता है तो उसे एक माह के भीतर इस आशय की सूचना सरकार को देनी होगी। सूचना में मदद का स्त्रोत, भारतीय मुद्रा में उसका मूल्य और किस तरह उसका इस्तेमाल किया गया, यह ब्योरा देना होगा। पहले यह काम दो माह में करना जरूरी था। इससे पहले भी मोदी सरकार ने पिछले पांच साल में विदेशी चंदा प्राप्त करने और उसका उपयोग करने को लेकर नियम-कायदों को सख्त बनाया है। इसके तहत एफसीआरए नियमों का उल्लंघन करने वाले करीब 18000 एनजीओ के विदेशी चंदा हासिल करने की अनुमति समाप्त की गई है।