
शवों के संरक्षण के लिए मिस्र में ममी बनाए जाने का जिक्र इतिहास की किताबों में मिलता है। लेकिन यह प्रक्रिया सिर्फ मिस्र में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई अन्य हिस्सों में भी अपनाई जाती रही है। हाल ही में एक रिपोर्ट आई है, जिससे खुलासा होता है कि शवों को संरक्षित करने की यह प्रक्रिया चीन में भी अपनाई जाती रही है। हालांकि विशेषज्ञ अब भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि चीन में ऐसा क्यों और किस तरह से किया जाता था।

चीन में ममी बनाए जाने की जो रिपोर्ट सामने आई है, उससे खुलासा होता है कि करीब 1,000 साल पहले एक बौद्ध भिक्षु का ममीकरण हुआ था। इसका खुलासा तब हुआ जब चीन के एक मठ में रखी पुरानी मूर्ति को वैज्ञानिकों ने स्कैन किया। इस स्कैनिंग से हैरान करने वाले खुलासे सामने आए। इससे पता चला कि पद्मासन की मुद्रा में बैठे बौद्ध भिक्षु की हड्डियों को किस तरह मूर्ति के अंदर अच्छी तरह संरक्षित कर रखा गया था।
बताया जाता है कि बौद्ध भिक्षु बेहद धार्मिक प्रवृति के थे। चीन के किसी हिस्से या तिब्बत क्षेत्र में उन्होंने काफी समय तक उपासना की और इस क्रम में वह उपवास भी रखते थे। वर्ष 1100 के आसपास उनकी मौत हुई। उस बौद्ध भिक्षु के बारे में कहा जाता है कि करीब 1,000 दिनों तक वह सिर्फ तरह-तरह के नट्स, बीज और बेरी खाकर रहे, ताकि शरीर से चर्बी को समाप्त किया जा सके।
इसके बाद अगले 1,000 दिनों तक वह एक खास तरह के पेड़ की छालों और उसकी जड़ों को खाकर जिंदा रहे। इन सबकी वजह से उन्हें लगातार उल्टियां हुईं और उनके शरीर में तरल पदार्थ तेजी से घटने लगा। इन सबने वास्तव में मृत्यु के बाद उनके शरीर के अंगों को नष्ट होने से रोकने के लिए संरक्षक के तौर पर काम किया। इसके बाद करीब 6 वर्षों तक वह बौद्ध भिक्षु संभवत: पत्थर से बने एक छोटे से मकबरे में हवा की नली और घंटी के साथ बंद रहा। माना जाता है कि तभी वह पद्मासन की मुद्रा में बैठे और तब तक इस मुद्रा में बैठे रहे, जब तक कि उनका निधन नहीं हो गया और लोगों को इस बारे में तब पता चला, जब घंटी नहीं बजने लगी।
इस संबंध में एक विशेषज्ञ के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि वह बौद्ध भिक्षु संभवत: मठ में करीब 200 वर्षों तक इसी मुद्रा में बैठे रहे, जिसके बाद जब उसकी स्थिति बिगड़ने लगी तो वहां रह रहे अन्य भिक्षुओं उनके शव को संरक्षित करने के मकसद से उसे मूर्ति के अंदर डाल दिया। माना जाता है कि ये अवशेष झांग के हैं, जिन्हें पैट्रिआर्क झांगगोंग और लिउक्वान झांगोंग के रूप में जाना जाता है। उनकी उम्र 30-50 साल के आसपास बताई जा रही है। खुद को ममीकृत करने का विचार भी उस बौद्ध भिक्षु का ही था और इसके पीछे एक जीवित बुद्ध बनने की इच्छा थी।