
किन्नरों का इतिहास महाभारत काल से मिलता है। इनका नाम आते ही हमारे सामने खुशी के पल मडराने लगते हैं। जिनमें वो अपने नृत्य और ढोलक की गूंज से हमारी खुशियों में चार चांद लगाते हैं। पर इनकी जिंदगी उतनी आसान नहीं जितना हम सोचते हैं। एक ओर तो इन्हें भगवान ब्रम्हा की परछाई माना जाता है तो दूसरी ओर कुछ लोग इनका मज़ाक भी उड़ाते हैं। कहा जाता है कि किन्नरों की दुवाएं या बद्दुआएं दोनों ही बहुत जल्द लगती है। आज हम किन्नरों की जिंदगी में छुपे कुछ ऐसे सच आपके सामने लाएंगे जिनसे अभी तक आप अंजान होंगे।

अंतिम संस्कार
किन्नरों का अंतिम संस्कार कैसे होता है, इसके बारे में कम लोग जाते हैं। उनकी शव यात्रा रात के वक्त निकाली जाती है। किसी गैर-किन्नर को अंतिम संस्कार देखने की इजाजत नहीं होती। माना जाता है कि अगर अंतिम संस्कार को कोई गैर-किन्नर देख लेेगा तो मरने वाला अगले जन्म में भी किन्नर ही पैदा होगा।
साल में सिर्फ एक दिन के लिए होती है शादी
किन्नरों की साल में एक दिन शादी होती है। यह शादी भी भगवान अरावन से होती है। उनकी मूर्ति को शहर में घुमाया जाता है। अगले ही दिन किन्नर श्रृंगार उतारकर विधवा की तरह शोक मनाते हैं और सफेद कपड़े पहन लेते हैं।
हरम की सुरक्षा करते थे किन्नर
मुगलों के जमाने में बेगमों के हरम की हिफाजत करने की जिम्मेदारी किन्नरों को दी जाती थी।
किन्नरों ने जीती है जंग
इतिहास में कुछ किन्नरों के जंग लड़ने का भी जिक्र है। इनमें से एक थे मलिक कफूर। उन्होंने दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के लिए दक्कन में जंग जीती थी।
एनुअल फेस्टिवल
किन्नरों का एनुअल फेस्टिवल साल में एक बार चेन्नई से 200 मील दूर कूवगम गांव में होता है। यहां पूरे भारत के किन्नर जमा होते हैं। तमिल नव वर्ष की पहली पूर्णिमा से 18 दिनों तक सेलिब्रेशन होता है। 17वें दिन किन्नरों के देवता भगवान अरावन की पूजा होती है। 18वें दिन सारे कूवगम गांव में अरावन की प्रतिमा को घुमाया जाता है और फिर तोड़ दिया जाता है। उसके बाद दुल्हन बने किन्नर अपना मंगलसूत्र तोड़ देते हैं।
अगले जन्म में नहीं बनना चाहते किन्नर
किन्नर बहुचरा माता की पूजा कर उनसे माफी मांगते हैं और ये दुआ मांगते हैं कि अगले जन्म में उन्हें किन्नर की तरह जन्म ना लेना पड़े।
किन्नरों को माना जाता है ब्रम्हाजी की परछाई
एक मान्यता के अनुसार, किन्नर भगवान ब्रह्मा की परछाई से ही जन्मे हैं। दूसरी मान्यता यह है कि अरिष्टा और कश्यप ऋषि से किन्नरों की उत्पति हुई है।
परम्पराएं हिन्दू धर्म कीं, लेकिन ज्यादातर गुरु होते हैं मुस्लिम
किन्नरों की ज्यादातर परम्पराएं हिन्दू धर्म के मुताबिक निभाई जाती हैं, लेकिन ज्यादातर किन्नर गुरु मुस्लिम होते हैं।
हर किन्नर का होता है एक गुरु
हर किन्नर का एक गुरु होता है। कहा जाता है कि गुरु को यह तक पता होता है कि उसके शिष्य की मौत कब होगी। गुरु वही बनता है जो जन्म से ही किन्नर हो। उसे गुरु नहीं बनाया जाता जाे किसी ऑपरेशन के बाद किन्नर बनाया गया हो।
नए किन्नरों का होता है स्वागत
किन्नर समाज में नए किन्नरों का स्वागत जोरदार तरीके से किया जाता है। इस फंक्शन में नाच-गाने के अलावा दावत भी होती है।