परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद की पत्नी का निधन

“हम जाएब फौज में’ तोहरे रोकले ना रुकब हम, समझलू” यह शब्द परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद के थे! शुक्रवार, दो अगस्त को उनकी पत्नी रसूलन बीवी (पच्चानवे वर्ष) का निधन हो गया है! वह कुछ दिनों से कुछ ज्यादा बीमार थी डॉक्टर ने दवा दी थी लेकिन मौसम बदलने की बात कहते हुए उन्होंने वाराणसी जाने से मना कर दिया था और दवा लेकर घर पर ही आराम कर रही थी! उनका बेटा भी तबीयत की खबर सुनकर गांव आ गया था, शुक्रवार दोपहर 2:00 बजे के क़रीब उन्होंने अंतिम सांस ली! उनकी प्रेरणास्रोत रहीं पत्नी रसूलन बीवी की उम्र करीब 95 वर्ष की थी! गाजीपुर के दुल्लहपुर क्षेत्र के धामूपुर गांव में आज रसूलन बीवी ने अंतिम सांस ली!

अब्दुल हमीद, जीडी नंबर-2639985, रैंक- हवलदार, यूनिट- फोर्थ ग्रिनेडियर्स, में अपनी सेवा दे रहे थे! हमीद भारतीय सेना के वो वीर हैं, जो वीरता और साहस का परिचय देते हुए 1965 के भारत-पाक युद्ध में कई पाकिस्तानी पेटन टैंकों को ध्वस्त कर दिया था! वीर अब्दुल हमीद ने सेना में भर्ती के बाद पहला युद्ध चीन से लड़ा और जंगल में भटक कर कई दिनों तक भूखे रहकर पत्ता तक खाया!पेड़ के पत्ते खाकर चीन से लड़ाई लड़ने वाले वीर अब्दुल हमीद को देश पर मरने वाले वीर सपूत का जब भी नाम लिया जाएगा है तो मरणोपरांत परमवीर चक्र विजेता शहीद अब्दुल हमीद का नाम हमेशा याद किया जाएगा,1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में उन्होंने दुश्मनों का खूब लोहा लिया था और फिर 1965 में पाकिस्तान के साथ हुई जंग में अमेरिका निर्मित अजेय पाँच पैटेन टैंक को हथगोले से उड़ाने में शहीद होने वाले अब्दुल हमीद की वीर गाथा को अपने पोते पोतियों औऱ नाती नातियों को सुनाकर उनकी वृद्ध विधवा रसुलन बीवी अक़्सर भावुक हो जाती थी! पाकिस्तान के पैटन टैंकों से लोहा लेने वाले अदम्य साहसी अब्दुल हमीद को परमवीर चक्र प्रदान किया जा चुका है! अब्दुल हमीद का जन्म एक जुलाई, 1933 को उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर ज़िले में स्थित धरमपुर नाम के छोटे से गांव में एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था!

एक बार तो अपने प्राणों की बाजी लगा कर गाँव में आई भीषण बाढ़ में डूबती दो युवतियों की जान बचायी. और अपने साहस का परिचय भी दिया था!अब्दुल हमीद की बचपन से ही इच्छा वीर सिपाही बनने की थी! वह अपनी दादी से कहा करते थे कि मैं फौज में भर्ती होऊंगा दादी जब कहती पिता की सिलाई की मशीन चलाओ तब वह कहते थे, हम जाएब फौज में’ तोहरे रोकले ना रुकब हम, समझलू! दादी को उनकी जिद के आगे झुकना पड़ा और कहना पड़ा, अच्छा-अच्छा झाइयां फौज में! गाँव में बचपन और किशोरावस्था में आम और बैर के फलों को पत्थर के एक वार से मारकर गिरा दिया करते थे! अब्दुल हमीद का दिल घर मे होने वाली सिलाई के काम में बिलकुल नहीं लगता था, उनका मन तो बस कुश्ती दंगल और दांव पेंचों में लगता था! उनके पिता और नाना दोनों ही पहलवान थे! वीर हमीद शुरू से ही लाठी चलाना कुश्ती करना और बाढ़ में नदी को तैर कर पार करना, और सोते समय फौज और जंग के सपने देखना तथा अपनी गुलेल से पक्का निशाना लगाना उनकी खूबियों में था! इनके पिता का नाम मोहम्मद उस्मान था! परिवार की आजीविका को चलाने के लिए कपड़ों की सिलाई का काम करने में पूरा परिवार लगा हुआ थ! एक बार तो अपने प्राणों की बाजी लगा कर गाँव में आई भीषण बाढ़ में डूबती दो युवतियों की जान बचायी. और अपने साहस का परिचय भी दिया था! हमीद दूसरो की मदद करना जरूरतमंद की सहायता करना और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना और उसे बर्दाश्त ना करना उनकी आदत में शुमार था!इक्कीस वर्ष के अब्दुल हमीद ने एक सैनिक के रूप में 1954 में अपना कार्य प्रारम्भ किया! हमीद सत्ताईस दिसंबर 1954 को ग्रेनेडियर्स इन्फैन्ट्री रेजिमेंट में शामिल किये गये थे! जम्मू काश्मीर में तैनात अब्दुल हमीद पाकिस्तान से आने वाले घुसपैठियों की खबर तो लेते हुए मजा चखाते रहते थे, ऐसे ही एक आतंकवादी डाकू इनायत अली को जब उन्होंने पकड़वाया तो प्रोत्साहन स्वरूप उनको प्रोन्नति देकर सेना में लांस नायक बना दिया गया! 1962 में जब चीन ने भारत की पीठ में छुरा भोंका तो अब्दुल हमीद उस समय नेफा में तैनात थे, उनको अपने अरमान पूरे करने का विशेष अवसर नहीं मिला! उनका अरमान था कोई विशेष पराक्रम दिखाते हुए शत्रु को मार गिराया जाए!

अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को बड़े पैमाने पर पैटन टैंक और गोला-बारूद की आपूर्ति के बाद सीमा पर सैन्य संतुलन काफी बिगड़ गया था! हथियार निर्यातक बड़े देशों के उकसाने पर पाकिस्तानी सेनाओं की गतिविधियां परस्पर विरोधी हो रही थी, इसी बीच रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के अधिकारियों की मांग पर रूस द्वारा निर्मित आर.सी.एल गन की खरीद की गयी, इसके तुरन्त बाद सीमा पर बढ़ती हुई दुश्मन की गतिविधियों के मद्देनजर इसके प्रशिक्षण की दरकार भी शुरू हो गई!जिसके बाद भारतीय सेना के अधिकारियों ने विभिन्न इन्फेन्ट्री डिवीजन की टुकड़ियों से अचूक मारक क्षमता के सैनिकों को प्रशिक्षण के लिए ढूंढ निकाला और मौऊ पूना,महाराष्ट्र स्थित प्रशिक्षण अकादमी में आर.सी.एल. का प्रशिक्षण लेने का गौरव अब्दुल हमीद को प्राप्त हुआ!अब्दुल हमीद को प्रशिक्षण ने उन्हें फोर्थ ग्रिनेडियर का सर्वश्रेष्ठ योद्धा बना दिया था!अब्दुल हमीद 1965 में पाकिस्तान वार से पहले दस दिन के लिए छुट्टी पर आए थे रेडियो से सूचना मिली तो हड़बड़ी में जंग के मैदान में जाने को बेताब हो गये, घर वाले मना करते रह गए, लेकिन वह जंग मे पहुँच गये! जिस जांबाजी से उन्होंने लड़ाई लड़ी वो फिर सबको पता है, गाँव वालों का कहना है कि ढ़ेला मारने में निशानची हमीद जी का वह हुनर हथगोले से पैटनटैंक तोड़ने के काम आया और शहीद होने तक सात पाकिस्तानी पैटनटैंक तोड़ने वाले शहीद को मरणोपरांत भारत का सेना में सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र उनकी बेवा रसुलन बीवी को पूरे सम्मान के साथ दिया गया! भारत-पाकिस्तान लड़ाई में खेमकरन सेक्टर में टैंक नष्ट करने के लिए परमवीर चक्र मिला था! यह जानना ज़रूरी हैं कि जो टैंक पाकिस्तानी सेना के लिए काफी अहम थे और अमेरिका से ही खरीदे किए गए थे!

अब्दुल हमीद ने अपनी वीरता की असाधारण मिसाल कायम करते हुए देश को गौरवान्वित किया, एक रिपोर्ट के अनुसार आठ सितम्बर1965 की रात में वह चीमा गांव के बाहरी इलाके में गन्ने के खेतों के बीच बैठे थे! तभी उनको दूर से आते हुए टैंकों की आवाज सुनाई दी, थोड़ी देर में उन्हें वो टैंक दिखाई भी देने लगे, उन्होंने टैंकों के अपनी रिकॉयलेस गन की रेंज में आने का इंतजार किया, गन्ने की फसल का कवर लिया और जैसे ही टैंक उनकी आरसीएल की रेंज में आए उन्होंने उन टैंक पर फायर कर दिया! इस युद्ध में उन्होंने
चार टैंक उड़ा दिए थे! उसके बाद भी उन्होंने कई अन्य टैंक भी उड़ाए दिए थे, हालांकि जब वह एक और टैंक को अपना निशाना बना रहे थे, तभी एक पाकिस्तानी टैंक की नजर में आ गए! दोनों ने एक-दूसरे पर एक साथ फायर किया! वो टैंक भी नष्ट हुआ और अब्दुल हमीद की जीप के भी परखच्चे उड़ गए! इस लड़ाई में पाकिस्तान की ओर से तीन सौ पैटन और चेफीज टैंकों ने भाग लिया था जबकि भारत की और से 140 सेंचुरियन और शर्मन टैंक मैदान में थे! पाकिस्तान द्वारा भारत पर हमला करने पर, उस हमले का जवाव देने के लिए भारतीय सेना के जवान उनका मुकाबला करने को खड़े हो गए! वीर अब्दुल हमीद पंजाब के तरन तारन जिले के खेमकरण सेक्टर में सेना की अग्रिम पंक्ति में तैनात थे! पाकिस्तान ने उस समय के अपराजेय माने जाने वाले अमेरिकन पैटन टैंकों के साथ, खेम करन सेक्टर के असल उताड़ गाँव पर हमला कर दिया था!

1965 की जंग में क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद को साहस का प्रदर्शन करते हुए वीरगति प्राप्त हुई थी! इसके लिए उन्हें मरणोपरान्त भारत का सर्वोच्च सेना पुरस्कार परमवीर चक्र प्रदान किया था! भारतीय सैनिकों के पास न तो टैंक थे और नहीं बड़े हथियार लेकिन उनके पास था भारत माता की रक्षा के लिए लड़ते हुए मर जाने का हौसला! भारतीय सैनिक अपनी साधारण थ्री नॉट थ्री रायफल और एल.एम्.जी. के साथ पैटन टैंकों का सामना करने लगे! हवलदार वीर अब्दुल हमीद के पास गन माउनटेड जीप थी जो पैटन टैंकों के सामने मात्र एक खिलौने के सामान थी! वीर अब्दुल हमीद ने अपनी जीप में बैठ कर अपनी गन से पैटन टैंकों के कमजोर अंगों पर एकदम सटीक निशाना लगाकर एक -एक कर धवस्त करना प्रारम्भ कर दिया! उनको ऐसा करते देख अन्य सैनकों का भी हौसला बढ़ गया और देखते ही देखते पाकिस्तान फ़ौज में भगदड़ मच गई! वीर अब्दुल हमीद ने अपनी गन माउनटेड जीप से सात पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट किया था! देखते ही देखते भारत का असल उताड़ गाँव पाकिस्तानी पैटन टैंकों की कब्रगाह बन गया! लेकिन भागते हुए पाकिस्तानियों का पीछा करते वीर अब्दुल हमीद की जीप पर एक गोला गिर जाने से वे बुरी तरह से घायल हो गए और अगले दिन नों सितम्बर को उनका स्वर्गवास हो गया लेकिन उनके स्वर्ग सिधारने की आधिकारिक घोषणा दस सितम्बर को की गई थी!

अट्ठाइस जनवरी, 2000 को भारतीय डाक विभाग द्वारा वीरता पुरस्कार विजेताओं के सम्मान में पांच डाक टिकटों के सेट में तीन रुपये का एक सचित्र डाक टिकट जारी किया गया! इस डाक टिकट पर रिकाईललेस राइफल से गोली चलाते हुए जीप पर सवार वीर अब्दुल हामिद का रेखा चित्र उदाहरण की तरह बना हुआ है! चौथी ग्रेनेडियर्स ने अब्दुल हमीद की स्मृति में उनकी क़ब्र पर एक समाधि का निर्माण किया है! हर साल उनकी शहादत के दिन यहां पर मेले का आयोजन किया जाता है! उनके गांव में एक डिस्पेंसरी, पुस्तकालय और स्कूल भी चलता हैं! सैन्य डाक सेवा ने दस सितंबर 1979 को उनके सम्मान में एक विशेष आवरण जारी किया है!