शिया धर्मगुरु मौलाना सय्यद कल्ब ए जव्वाद साहब ने सीतापुर में पढ़ी मजलिस

सीतापुर मे एक मजलिस का अयोजन क़ज़ियारा स्थिति सज्जादिया इमाम बारगाह में स्व.सय्यद नासिर इमाम ज़ैदी उर्फ़ सिकन्दर नवाब साहब के चालीसवें की मजलिस का अयोजन हुआ जिस मे शिया धर्म गुरू मौलाना कल्ब ए जव्वाद साहब ने पढ़ी और उपस्थित लोगों को शिक्षा एवं विकास के प्रति प्रशस्त होनें का सन्देश देते हुए आग्रह किया के हम सबको अपने अन्दर ज़्यादा से ज़्यादा हुनर और क़ाबिलियत का विकास करना चाहिए तभी हम और सफ़ल हो सकते है , क्यूँकि जब तक हमारे अन्दर कोई हुनर या क़ाबिलियत नहीं पायी जाएगी तब तक हम मात्र भीड़ का एक हिस्सा बराबर हैं जो बस पेट की भूख और ज़िन्दगी की जरूरतों को पूरा करना ही अपनी ज़िन्दगी का लक्ष्य समझते हैं ! उन्हें इससे कोई मतलब नहीं होता के वोह किसी और के लिए कुछ काम आ सकें , उनके अन्दर कुछ ऐसा हुनर हो कुछ ऐसी क़ाबिलियत हो जिसके बाक़ी के लोग क़ायल हों !
और इन सब में कमी का कारण है इल्म से दूरी और अपनी तहज़ीब की अनदेखी ।

जव्वाद साहब ने इसकी मिसाल पहले इमाम हज़रत अली अलैहिस्सलाम से देते हुए बताया के हज़रत अली अलैहिस्सलाम क्यूँ सभी धर्मो के मानने वालों के प्रिय थे और क्यूँ पूरी दुनिया आज तक हज़रत अली के चरित्र का लोहा मानती है ! जव्वाद साहब ने स्पष्ट किया , ” जिस तरह हम जब किसी चीज़ या हुनर को पसन्द करतें है तो उससे मुहब्बत करने लगतें है और जब वही चीज़ या हुनर किसी व्यक्ति विशेष के अन्दर पायी जाती है तो हम उस व्यक्ति विशेष को महबूब बना लेतें हैँ । ठीक उसी तरह जैसे के अगर किसी को ज्ञान पसन्द है तो उसे यदि कोई ज्ञानी मिल जाए तॊ उससे मुहब्बत हो जाती है ।

यदि किसी को दान करना पसन्द है और उसे कोई अच्छा दानी मिल जाए तॊ वोह मेहबूब बन जाता है । यदि किसी को वीरता पसन्द है तॊ उसे किसी वीर से मुहब्बत हो जाती है । ठीक उसी प्रकार हज़रत अली अलैहिस्सलाम एक ऐसा चरित्र थे जिनके अन्दर हर तरह के कमाल मौजूद थे । ज्ञानी इतने बड़े थे के स्वयं रसूल ए ख़ुदा (स्व .अ .वा .व ) ने कहा के मैं इल्म यानी के ज्ञान का नगर हूँ और अली उसका दरवाज़ा हैँ ।वीर ऐसे थे के जंग ए ख़ैबर में वोह दरवाज़ा जिसे 150 लोग मिलकर खोला करते थे उसे अपने हाथ से उखाड़ कर हवा में उछाल दिया।

दानी इतने बड़े थे के जब सुना के हातिमताई सौ दरवाज़ों से लोगों को दान करता था तॊ आपने कहा के ऐसे दान का क्या फ़ायदा के आदमी को सौ दरवाज़े तक जाना पड़े , एक ही दरवाज़े से इतना दान करो के किसी को दूसरे दरवाज़े पर जाने की ज़रूरत ही न पड़े ।

यहीं हुनर और क़ाबिलियत वजह थी के आज तक 1400 साल बीत जाने के बाद भी दुनिया का तक़रीबन हर क़ाबिल और अक्लमन्द आदमी हज़रत अली अलैहिस्सलाम की कही हुई बातों , उनके द्वारा अपने दौर ए हुकूमत में जनता के लिए किए गये प्रबंधन , उनकी जनमानस के लिए बिना किसी भेदभाव के सेवा करना इत्यादि का लोहा मानता हैं !

इसी प्रकार बहुत सी ऐसी क़ाबिलियत हैं और हुनर हैं जो हर एक के अन्दर कुछ न कुछ पाया जाता है , मगर ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है के सदियों में ऐसा कोई विरला जन्म लें जिसके हर अन्दाज़ में एक क़ाबिलियत हो जिसके पास हर हुनर मौजूद हो , जो सिर्फ़ दूसरों के लिए जिए !
यह सब क़ाबिलियत और हुनर मौजूद थे हज़रत अली में जिस कारण आज तक वोह दुनिया भर में लोगों की आँखों का तारा हैं ।

जव्वाद साहब ने अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा के जब तक कोई क़ौम अपने लीडर या इमाम के चरित्र को अपने अन्दर न ढाल लें , तब तक वोह अपने लीडर से सच्ची मुहब्बत का दावा नहीं कर सकती ।