
जिले के महत्वपूर्ण दस सागरों और जमींदारी नहरों को किसी भगीरथ का इंतजार है, जो आए और इनकों संवार कर नया जीवन प्रदान करे। यदि यह संवर जाए तो न केवल किसानों की तकदीर का ताला खुल जाएगा, बल्कि तराई क्षेत्र में एक बार फिर कालानमक की फसल लहलहा उठेगी। कालानमक के धान की महक धीरे-धीरे कम होती जा रही, जिसके मुरीद होकर कभी अंग्रेजों ने जमींदारी नहर का निर्माण कराया था। अफसोस यह कि उनके जाने के बाद यह सागर व इनसे जुड़ी नहरें बदहाल हो गईं। सिल्ट व गाद से पटते-पटते जहां उनकी जल संग्रहण क्षमता कम हो गई, वहीं जमींदारी नहरें भी क्षतिग्रस्त होकर अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही हैं।

कालानमक के उत्पादन के लिए इसकी देर से रोपाई के साथ ही इसके खेत में लगातार दो फिट पानी भरा होना चाहिए। जब खेतों में कम से कम दो इंच मोटी काई की परत जम जाती है तो इसका उत्पादन बेहतर होता है। जब इसमें बालें फूटने लगे, तो उस समय तापमान कम होना चाहिए। नवंबर का महीना इसके लिए मुफीद माना जाता है। जब सागर व जमींदारी नहरें संचालित हो रही थीं, तो परिस्थितियां इसके लिए अनुकूल थीं। इनके बदहाल होते ही इसकी महक भी गुम होती चली गई।
एक नजर सागरों पर
नाम- कैचमेंट एरिया-डूब क्षेत्रफल-पानी की गहराई
बजहा 58.59 वर्ग किमी 176.40 हेक्टेयर 1.05 मीटर
मझौली 48.43 वर्ग किमी 34.88 हे. 1.25 मीटर
सिसवा 30.34 वर्ग किमी 70 हे. 1.47 मीटर
मर्थी 48.64 वर्ग किमी 6.52 हे. 1.53 मीटर
सेमरा 6 वर्गमील 48.5 हे. 1.05 मीटर
मसई 16.15 वर्गकिमी 38 हे. 1.34 मीटर
महली 10 वर्गमील 48.4 हे. 1.12 मीटर
शिवपति ——- 36.44 हे. 1.53 मीटर
मोती ——- 36 हे. 0.90 मीटर
बटुआ —– 43.30 हे. 1.07 मीटर
243 किमी है नहरों का जाल
इन सागरों से जुड़ी 243 किमी लंबी नहरों का संजाल फैला हुआ है, जिसे जमींदारी नहर प्रणाली के नाम से जाना जाता है। इसी पर कालानमक की पूरी खेती टिकी हुई थी। पूरा मेटुका यानी तराई क्षेत्र इसके दम पर कालानमक की खुशबू से महकता था। इनके बदहाल होते ही इसकी खुशबू भी धीरे-धीरे सिमटती चली गई। प्रधानमंत्री कृषि ङ्क्षसचाई योजना के तहत इन सागरों व जमींदारी नहरों के पुनरुद्धार के लिए विस्तृत कार्ययोजना शासन में धूल फांक रही है। स्वीकृति एवं धन अवमुक्त होने का इंतजार है। धन मिले तो सागरों व जमींदारी नहरों का कायाकल्प हो जाएगा और कालानमक धान फिर महक उठेगा।