राहुल ऐसे तीसरे गांधी जो एक चुनाव में दो सीटों से मैदान में होंगे

राहुल अमेठी के साथ-साथ केरल की वायनाड़ सीट से भी चुनाव लड़ेंगे। आखिर क्या वजह है कि नेता दो सीटों से चुनाव लड़ना चाहते हैं। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं ऐसा दो वजह से होता है। पहली- नेताओं को परंपरागत सीट पर हार का डर। दूसरी- दूसरे राज्य में जाकर रणनीतिक संदेश देना। जैसा मोदी ने किया। मोदी वड़ोदरा और यूपी की काशी (बनारस) सीट से लड़े। फायदा पार्टी को मिला। भाजपा ने यहां 80 में से 71 सीटें जीत लीं।

सबसे पहले इतिहास

1996 से पहले तक नेता तीन सीटों से चुनाव लड़सकते थे। रिप्रजेन्टेशन ऑफ द पीपुल एक्ट (1951) में संशोधन के बाद यह तय हुआ कि कोई भी उम्मीदवार दो से अधिक सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकता।

आपातकाल से पहले का दौर

1957 में 32 साल के अटल बिहारी वाजपेयी ने यूपी की तीन सीटों बलरामपुर, मथुरा, लखनऊ से चुनाव लड़ा। सिर्फ बलरामपुर से जीते। मथुरा में तो जमानत जब्त हो गई थी।

आपातकाल के बाद

1977 में इंदिरा गांधी अपनी सीट रायबरेली से हार गई थीं। 1980 में इंदिरा दो सीटों रायबरेली (यूपी) और मेडक (अब तेलंगाना में) से उतरीं। दोनों सीटों से जीतीं।

एक नेता, एक सीट

आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से सेक्शन 33(7) में संशोधन सिफारिश की थी। ताकि एक नेता, एक सीट पर ही लड़े।

एक सीट पर चुनाव का खर्च यूं समझिए: 2014 में 543 सीटों पर आयोग ने 3,426 करोड़ रुपए खर्च किए थे। यानी एक सीट पर 6.30 करोड़। उपचुनाव में दोबारा इतना ही खर्च होगा।

अटल बिहारी वाजपेयी : अटल 1991 में विदिशा और लखनऊ से चुनाव में उतरे। दोनों जगहों से जीते। 1996 में वे गांधीनगर और लखनऊ से उतरे। दोनों जगह जीते। 13 दिन की सरकार बनाई।

लालकृष्ण आडवाणी

1991 में नई दिल्ली और गांधीनगर से चुनाव मैदान में उतरे। दोनों जगह जीते।

सोनिया गांधी

1999 में बेल्लारी और अमेठी से चुनावमें उतरीं और जीतीं।

एनटी रामाराव

1985 आंध्र विधानसभा चुनाव में गुडिवडा, हिंदुपुर और नालगोंडा से लड़े। तीनों जगह जीते।

मुलायम सिंह यादव

2014 में आजमगढ़ और मैनपुरी से चुनाव में उतरे और जीते।

लालूप्रसाद यादव

2009में सारन और पाटलिपुत्र से चुनाव मैदान में उतरे और जीते।

देवीलाल

1991 में देवीलाल तीन लोकसभा सीटों- सीकर, रोहतक, फिरोजपुर से चुनाव लड़ा। सीकर, रोहतक से जीत गए। फिरोजपुर से हार गए