यह मुद्दा बहुत बड़ा, सेहत सेवाएं हुईं बौनी और बढ़ता गया नेताओं का कद

Loksabha Election 2019 चुनाव के महासमर में शोरगुल तो बहुत है, लेकिन आम लोगों की सेहत का मुद्दा गायब है। पंजाब में सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। कहीं डॉक्टर नहीं हैं, तो कहीं दवाइयों की कमी है। बठिंडा में एम्स जैसा बड़ा प्रोजेक्ट सियासी खींचतान के चलते अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझती मालवा बेल्ट को भी अब तक कोई स्तरीय चिकित्सा संस्थान नहीं मिला है।

जानकारों के अनुसार, राज्य में कमजोर पड़ी स्वास्थ्य सेवाओं को टॉनिक देने के लिए सरकारें नाकाम रही हैं। इस क्षेत्र में सांसद भी कुछ खास नहीं कर पाए। प्रदेश व देश की राजनीति में नेताओं का कद तो बढ़ता रहा, लेकिन सेहत सेवाएं लगातार बौनी होती चली गईं। कई अस्पतालों में चिकित्सा उपकरण नहीं हैं, तो कहीं ट्रॉमा सेंटर बंद पड़े हैं।

अकाली-भाजपा सरकार के कार्यकाल के दस साल और मौजूदा कांग्रेस सरकार के दो साल के कार्यकाल में सेहत सेवाओं की तबीयत सुधरने की बजाय बिगड़ी है। केंद्र सरकार के बल पर चलने वाले ईएसआइ अस्पताल व डिस्पेंसरियों में डॉक्टरों की कमी पूरी नहीं हो सकी। हालांकि इन्हें केंद्र से अच्छा खासा राजस्व मिलता है। 2014 में चुने गए सांसद भी सरकारी अस्पतालों को ग्रांट देने में कतराते रहे।

सरकारी अस्पताल गंभीर मरीजों को वेंटीलेटर की सुविधा के लिए सरकारी मेडिकल कॉलेजों व निजी अस्पतालों में भेज रहे हैं। मेडिकल अफसर (स्पेशलिस्ट) के 297 पद खाली हैं। नर्सों के भी 312 पद खाली पड़े हैं। लुधियाना शहर की आबादी 40 लाख के करीब है, लेकिन जिले के सिविल अस्पताल में मात्र 36 डॉक्टर हैं। इतने ही डॉक्टर आज से 15 साल पहले भी थे। बर्न यूनिट बच्चों के वार्ड की कमी है। अमृतसर सिविल अस्पताल में पिछले नौ वर्षों से ट्रॉमा सेंटर बंद है। गुरुनानक देव अस्पताल में वर्ष 2018 में कैथ लैब का शुभारंभ हुआ, लेकिन दो मरीजों के हार्ट प्रोसीजर करने के बाद यह लैब अचानक बंद हो गई।

नहीं मिला नया सरकारी मेडिकल कॉलेज, एम्स भी ठंडे बस्ते में

राज्य में युवाओं के डॉक्टर बनने का सपना साकार करने के लिए केंद्र व राज्य सरकार कोई नया सरकारी मेडिकल कॉलेज खोलने में नाकाम रही है। अमृतसर, पटियाला व फरीदकोट मेडिकल कॉलेजों को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के मापदंडों पर उतारने में भी राज्य सरकार फिसड्डी साबित हुई है। इसी साल एमबीबीएस का दाखिला करने के लिए हुई इंस्पेक्शन में इन कॉलेजों पर सवालिया निशान लगे हैं।

निजी मेडिकल कॉलेजों की मनमानी के आगे सरकार भी घुटने टेक चुकी है। निजी कॉलेज विद्यार्थियों की जेब काट रहे हैं। बठिंडा एम्स का प्रोजेक्ट भी लटक गया है। इसे लेकर इन दिनों केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल और प्रदेश सरकार आमने-सामने हैं।

इलाज में डेढ़ लाख रुपये की मदद कर पीठ थपथपा रही सरकार

पंजाब में कैंसर की स्थिति भयावह होती जा रही है। इलाज के लिए स्वास्थ्य केंद्र खोले जा रहे हैं, लेकिन बीमारी की वजह हाथ में नहीं आ रही। मालवा के साथ अब माझा भी कैंसर की चपेट में आ चुका है। पिछले साल के अंत तक बठिंडा के मुकाबले अमृतसर में कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ी है।

मुख्यमंत्री कैंसर राहत राहत कोष से अमृतसर में 771 मरीजों को 11,44,74,116 रुपये व बठिंडा में 510 मरीजों को 7,40,73,600, लुधियाना में 636 मरीजों को 8,11,12,615 रुपये व संगरूर में 548 के 7,93,67,409 रुपये जारी किए गए। विभाग की ओर से संगरूर व बठिंडा  में कैंसर के इलाज के लिए टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल के सहयोग से सेंटर स्थापित किए हैं। मंहगा इलाज होने की वजह से डेढ़ लाख रुपये खर्च होने के बाद अस्पताल मरीजों से पैसे वसूलने लगते हैं। गरीब मरीज अधूरे इलाज के कारण मौत के मुंह में जा रहे हैं

अनीमिया दूर करने में विभाग की कछुआ चाल

पंजाब की लड़कियों में देश के मुकाबले अनीमिया की दर ज्यादा है। नेशनल फैमिली हाउसहोल्ड सर्वे (एनएफएचएस-4) के अनुसार 15-19 साल आयु वर्ग में देश में 54 व पंजाब में 58 फीसद किशोरियां खून की कमी का शिकार हैं। पंजाब में 20 फीसद गर्भवती महिलाओं की मौत खून की कमी के कारण हो रही है। पूरा जोर लगाने के बावजूद 2006 से 2016 तक किशोरियों में दो व किशोरों में एक फीसद गिरावट दर्ज हो पाई है

दवाइयों की कमी नहीं हो रही दूर

1 जनवरी 2013 को तत्कालीन  सेहत मंत्री मदन मोहन मित्तल ने सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाने वाले मरीजों की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए 235 प्रकार की मुफ्त दवाइयां देने के आदेश जारी किए थे। सरकारी अस्पतालों में 159 प्रकार की दवाइयों के बड़े-बड़े बोर्ड भी लगवाए गए। अस्पतालों की ओर से दवाइयों की डिमांड भेजने के बाद स्टॉक के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। अब सेहत विभाग ने दवाइयों की सूची को संशोधित कर संख्या 226 तक पहुंचा दी है।

वार्डों में 114 सर्जिकल और कंज्युमेबल गु्ड्स की सूची जारी की थी। सेहत विभाग सरकारी अस्पतालों में जारी के सूची के अनुसार पूरी दवाइयां मुहैया करवाने में नाकाम रहा है। अभी 50 फीसद दवाइयों का स्टॉक ही मिल रहा है। मरीजों को महंगी दवाइयों का दर्द सहन करना पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में रैबीज के टीकों की अकसर कमी रहती है। दवाइयों की खरीद लोकल स्तर पर करने के लिए अस्पतालों के हाथ बंधे हुए है।

इन दवाइयों की कमी

एंटी एलर्जी, एंटी बायोटिक्स, पैरासीटामोल, दर्द निवारक, पेट दर्द, ग्लूकोज, खांसी की दवा, चर्म व बाल रोग की दवाएं, दांतों से संबंधित दवाइयां। इसके अलावा दर्द निवारक टीके, स्टीरॉयड टीके व गोलियां, एंटी रैबीज, बच्चों के इलाज में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर सिरप आदि।

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स्वास्थ्य मानक

विषय-                          पंजाब               भारत

लिंग अनुपात (0-6)     895/1000         933/1000

मातृ मृत्यु दर            122/एक लाख      130/एक लाख

बाल मृत्यु दर             23/1000             44/1000

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पंजाब में दस हजार की आबादी पर डॉक्टर

मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के अनुसार देश में 1700 की आबादी पर एक डॉक्टर है, जबकि दुनिया में एक हजार की आबादी पर 1.5 डॉक्टर है। देश में 2031 तक देश में एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर का अनुपात करने की योजना है। पंजाब में करीब दस हजार की आबादी पर एक सरकारी डॉक्टर है।

सरकारी अस्पतालों का नेटवर्क

जिला स्तरीय अस्पताल-         22

सब डिवीजनल अस्पताल-       41

कम्युनिटी हेल्थ सेंटर-           151

प्राइमरी हेल्थ सेंटर-               432

शहरी प्राइमरी हेल्थ सेंटर-      63

शहरी कम्युनिटी हेल्थ सेंटर-  13

डिस्पेंसरियां-                       1285

आयुर्वेदिक विभाग

डिस्पेंसरियां- 507

अस्पताल- पांच

कुल डॉक्टरों के पद- 524

खाली पड़े पद- 222

होम्योपैथिक  विभाग

डिस्पेंसरी-                215

डॉक्टरों के खाली पद-   61

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डॉक्टरों की स्थिति

-पंजाब मेडिकल काउंसिल में पंजीकृत डॉक्टर- 24000 (वोट 17000)

-आइएमए के सदस्य-                                  7700

-पंजाब डेंटल काउंसिल में पंजीकृत डॉक्टर-     13000

-आइडीए के सदस्य-                                   3000

-इंटेग्रेटिड डॉक्टर-                                     18000

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हर साल नए तैयार हो रहे डॉक्टर

एमबीबीएस-                    1145

बीडीएस-                         1100

होम्योपैथिक व आयुर्वेदिक- 880

कारपोरेट सेक्टर हुआ मजबूत

” राज्य में पिछले दो दशक में सरकारी सेहत सेवाएं कमजोर और निजी सेक्टर मजबूत होता गया। पंजाब हेल्थ सिस्टम कारपोरेशन के बैनर तले सरकारी अस्पतालों की आलीशान इमारतें खड़ी कर दी गईं, लेकिन उनमें सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए डॉक्टर और स्टाफ की तैनाती करने में पिछड़ गए। स्टाफ की कमी के चलते सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी पूरी करने के चक्कर में इनकी संख्या में लगातार कटौती की गई। कई नेशनल प्रोग्राम भी चलाए गए, लेकिन फील्ड फोर्स पूरी होने के कारण उनके भी पूरे नतीजे नही मिले। सरकारी अस्पतालों में सेवाएं व दवाइयां मुफ्त देने की योजना भी सेवाओं का गिरता स्तर उठाने में नाकाम रहीं। सरकारी अस्पतालों में ज्यादातर दवाइयों की कमी से मरीजों को निराशा होने लगी।

लंबे अर्से से वॉक-इन-इंटरव्यू होने के बावजूद पिछले दस साल में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी पूरी नही हुई। निजी सेक्टर ने कारपोरेट का रूप धारण कर लिया। राज्य में स्पेशलिस्ट डॉक्टर व मरीज कारपोरेट अस्पतालों का रुख करने लगे। डॉक्टरों को अच्छा वेतन मिलने में खुशी मिली और मरीजों को महंगा इलाज करवाने के लिए कर्ज का बोझ सहना पड़ा। यहीं नही सरकारी तंत्र में आयुर्वेदिक व होम्योपैथिक पद्धति भी बीमार होती गई और सरकार इनका इलाज करने में भी पिछड़ी रही।

70 के दशक के बाद के पंजाब के सरकारी मेडिकल कॉलेज नही मिला। फार्मेसी, लैबोरेटरी टेक्निशियन व चिकित्सा जगत से जुड़ी अन्य पैरा मेडिकल की शिक्षा में भी निजी सेक्टर पूरी तरह घुस गया। चिकित्सा शिक्षा महंगी होने व भविष्य अंधकार में जाने की वजह से लोग इस फील्ड से दूरी बनाने लगे। केंद्र व राज्य सरकार ने मुलाजिमों की रेगुलर भर्ती करने की बजाय यूथ को ठेके पर नौकरियां देकर उनका सरकारी नौकरी पाने का सपना धूमिल किया। इसीलिए सेहत सेवाएं सुधारने में पिछड़ते रहे।

सेहत को लेकर कितने सक्रिय रहे आपके सांसद

हरसिमरत कौर बादल, बठिंडा (शिअद)

बठिंडा में एम्स जैसा बड़ा प्रोजेक्ट लाने में कामयाब रहीं। हालांकि राज्य सरकार से खींचतान के चलते अभी यह शुरू नहीं हो पाया है।

भगवंत मान, संगरूर (आप)

दूषित पानी व कैंसर की समस्या पर संसद में सवाल उठाए। स्वास्थ्य पर 83 लाख की ग्रांट खर्ची। 11 एंबुलेंस दी।

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सुनील जाखड़, गुरदासपुर

मेडिकल कॉलेज की घोषणा करवाई। हालांकि, अभी इस प्रोजेक्ट पर कोई काम शुरू नहीं हुआ है। अस्पतालों के लिए ग्रांट दी।

प्रो. साधू सिंह : फरीदकोट (आप)

कैंसर मरीजों के इलाज के लिए केंद्र सरकार से 1.25 करोड़ की राशि जारी करवाई। सेहत विभाग को एक एंबुलेंस दिलवाई।

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शेर सिंह घुबाया: फिरोजपुर (शिअद, अब कांग्रेस में )

शुद्ध पेयजल के लिए आरओ प्लांट लगवाए। सरहदी इलाकों में पानी की सैंपलिंग करवाई। टैंकरों से साफ पानी की सप्लाई दी।

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चौधरी संतोख सिंह, जालंधर (कांग्रेस)

शहर सिविल अस्पताल को दो वेंटीलेटर व 12 फीसद ग्रांट खर्ची। जालंधर में एम्स की मांग। पीएचसी में सुधार।

गुरजीत औजला, अमृतसर (कांग्रेस)

गुरुनानक देव अस्पताल, टीबी अस्पताल, ईएसआइ अस्पताल का मुद्दा संसद में उठाया। कई अस्पतालों को ग्रांट दी।

धर्मवीर गांधी, पटियाला (आप से बर्खास्त)

संसद में स्वास्थ्य बीमा, सेनेटरी पैड्स व एचआइवी एड्स का मुद्दा उठाया। 1.97 करोड़ मंजूर कराए। ग्रांट का बड़ा हिस्सा सेहत सेवाओं पर खर्चा।

विजय सांपला, होशियारपुर (भाजपा)

अपने संसदीय हलके में स्वास्थ्य से संबंधित कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं ला पाए।

प्रेम सिंह चंदू माजरा, श्री आनंदपुर साहिब (शिअद)

नया मेडिकल कॉलेज खोलने की मांग की, लेकिन स्वास्थ्य से संबंधित कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं ला पाए। अस्पतालों में एंबुलेंस दीं।

रवनीत सिंह बिट्टू, लुधियाना (कांग्रेस)

पंजाब में कमजोर स्वास्थ्य सेवा पर सवाल उठाया। बड़ा प्रोजेक्ट लाने में कामयाब नहीं रहे। अस्पतालों में एंबुलेंस दीं।

रंजीत सिंह ब्रह्मपुरा, खूडर साहिब (शिअद)

कैंसर रीजन के लिए विशेष फंड का सवाल संसद में उठाया। कुल ग्रांट में से 14 फीसद सेहत सेवाओं पर खर्च की।

हरिंदर सिंह खालसा, फतेहगढ़ साहिब (आप से बर्खास्त)

अपने हलके के कई सरकारी अस्पतालों को एंबुलेंस सेवा प्रदान की है। कोई बड़ा ट्रॉमा सेंटर नहीं ला सके। सवाल भी नहीं उठा पाए।