
जातीय समीकरण शुरु से ही अहम भूमिका निभाता आया है, ऐसे में सभी पार्टियां अपनी चुनावी रणनीति जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही बनाती हैं।
राजनैतिक दल अपने मुख्य वोट बैंक के इतर दूसरे वोट बैंक में सेंधमारी की पूरी कोशिश में जुटे हैं।
यूपी में 25 फीसदी वोट बैंक मुख्य रूप से दलितों का है। इसके बाद अगड़ी जाति का वोट बैंक जोकि तमाम जातियों में बंटा है वह भी प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। इसमें मुख्य रूप से ब्राह्मण, ठाकुर आते हैं जिनके वोटों पर सभी धर्मों की नज़र रहती है। इसके अलावा पिछड़ी जातियों का वोट बैंक भी प्रदेश के चुनाव में अहम भूमिका निभाता है।एक तरफ जहां दलितों का वोट बैंक 25 फीसदी है तो ब्राह्मणों का वोट बैंक 8 फीसदी, 5 फीसदी ठाकुर व अन्य अगड़ी जाति 3 फीसदी है। ऐसे अगड़ी जाति का कुल वोट बैंक तकरीबन 16 फीसदी है।
वहीं पिछड़ी जाति के वोट बैंक पर नज़र डालें तो यह कुल 35 फीसदी है, जिसमें 13 फीसदी यादव, 12 फीसदी कुर्मी और 10 फीसदी अन्य जातियों के लोग आते हैं। इन सभी जातियों पर तमाम दलों का अलग-अलग वोट बैंक है। एक तरफ जहां सपा को पिछड़ी जाति का अगुवा, तो बसपा को दलित वोट बैंक का प्रतिनिधि तो भाजपा को अगड़ी जाति का पैरोकार माना जाता है।
उत्तर प्रदेश में 18 फीसदी मुस्लिम व 5 फीसद जाट वोट बैंक भी प्रदेश की राजनीति में काफी अहम भूमिका निभाता है, जिनपर तमाम दलों की नजर रहती है। मुस्लिम वोटों पर भी हाल के सालों में सपा की पैठ रही है। बीजेपी को यूपी में आने से रोकने के लिए मुस्लिम समुदाय उस पार्टी को वोट देगी जो उनको कड़ा मुकाबला दे 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के दम पर 80 में से 71 सीटें जीती थी।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सर्वाधिक पिछड़ों की खासी अहम भूमिका…
उत्तर प्रदेश की जातीय समीकरण में सामान्य वर्ग की संख्या-20.95, अन्य पिछड़े वर्ग की संख्या -54.05, अनुसूचित जाति-24.94 व अनुसूचित जनजाति-0.06 प्रतिशत है। अन्य पिछड़े वर्ग की 54.05 प्रतिशत की आबादी में यादव/अहिर-19.40 यानी 10.46 प्रतिशत , अतिपिछड़े वर्ग लोधी, कुर्मी, जाट, गूजर, सोनार, अरख, गोसाई, कलवार आदि की आबादी 10.22 प्रतिशत जिसमें कुर्मी-7.46, लोध-6.06, जाट-3.60, गूजर-1.71, कलवार-0.70 प्रतिशत हैं। अत्यन्त पिछड़े वर्ग/ईबीसी की आबादी अन्य पिछड़े वर्ग में 61.59 प्रतिशत यानी कुल जनसंख्या में 33.34 प्रतिशत है। जिसका उत्तर प्रदेश की राजनीति में खासा महत्व है। अत्यन्त पिछड़े वर्ग में निषाद/कश्यप/बिन्द/किसान/रायकवार-12.91 प्रतिशत, पाल/बघेल-4.43, कुशवाहा/मौर्य/शाक्य/काछी/माली-8.56, मोमिन अंसार-4.15, तेली/साहू-4.03, प्रजापति-3.42, हज्जाम/नाई/सविता-3.01, राजभर-2.44, चैहान/नोनिया-2.33, बढ़ई/विश्वकर्मा-2.44, लोहार-1.81, फकीर-1.93, कन्डेरा/मंसूरी-1.61, कान्दू/भुर्जी-1.43, दर्जी-1.01, व अन्य अत्यन्त पिछड़ी जातियों की संख्या-12.97 प्रतिशत है। समाजवादी पार्टी का ध्यान अभी तक बीएटीएम समीकरण (ब्राह्मण, अहिर, ठाकुर, मुस्लिम) पर ही रहा है परन्तु भाजपा के सामाजिक समीकरण का जवाब देने के लिए उसका अब विशेष ध्यान एमएवाई (मुस्लिम, अतिपिछड़ा/अत्यन्त पिछड़ा, यादव) समीकरण की ओर हुआ है, कारण कि सपा का परम्परागत वोटर यादव मुस्लिम को माना जाता है परन्तु उत्तर प्रदेश के समीकरण में अतिपिछड़ी, विशेषकर सर्वाधिक पिछड़ी जातियों का 50 प्रतिशत से अधिक रूझान जिस दल की ओर होता है, उत्तर प्रदेश में वहीं दल सिकन्दर बनता है।
क्या 2019 में एक बार फिर से यूपी भाजपा में मोदी लहर का फायदा उठा पायेगी या मायावती अखिलेश कांग्रेस यूपी भाजपा में मंसूबों पर पानी फेर देगी।
चुनाव में सभी राजनीतिक दल विकास का राग जरूर अलाप रहे हैं, पर हकीकत यह है कि सभी पार्टियां अपनी जीत के लिए जाति के गणित को साधने में जुटी हुई हैं। बीजेपी हिंदुओं को एकजुट करने पर काम कर रही है, उसे देखते हुए लगता है कि एसपी, बीएसपी और कांग्रेस का जातीय गणित गड़बड़ा सकता है।
सभी पार्टियां ये जानती हैं कि सिर्फ मुद्दों से चुनाव नहीं जीता जा सकता.
तमन्ना फरीदी कलमकार