अगड़ी जाति के वोटों की बहुत आवश्यकता है बीजेपी को

2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र हाल में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल के साथ हाथ मिला कर नया गठबंधन तैयार कर लिया है.

इसी के साथ यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या ये राजनीतिक गठबंधन पिछड़े वर्ग, दलित और मुसलमानों के सामने एक सामाजिक दोस्ताने के रूप में दिखेगा.

अगर ये पार्टियां इस तरह का गठबंधन सफलतापूर्वक कर सकती हैं तो क्या वो बीजेपी के राजनीतिक गुणाभाग को चुनौती दे पाएंगी ख़ासकर तब जबकि वो अपनी चुनावी सफलता के लिए अगड़ी जाति के वोटबैंक पर निर्भर करती है.चुनाव से पहले दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों के लिए चुनावी वादे किए जाते रहे हैं, लेकिन 2019 चुनाव में पारंपरिक रूप से वंचित माने गए इन तबकों के बजाय अगड़ी जातियों की फ्रीक्वेंसी फाइनट्यून करने की ज्यादा कोशिश दिख रही है. उत्तर प्रदेश में करीब 20 फीसदी सवर्ण वोटर हैं.और लोकसभा की 80 सीटें इस नए गठबंधन के बनने के बाद इस तरह की चर्चा आम होने लगी है कि 2019 के चुनावों में दलित, जाट, मुसलमान और यादव वोटबैंकों की आख़िर कितनी अहमियत होगी.

इस चर्चा के बीच हम अक्सर ये भूल जाने की ग़लती कर बैठते हैं कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सफलता के लिए अगड़ी जाति यानी सवर्णों का वोटबैंक बेहद महत्वपूर्ण है.

पार्टियां चाहती हैं कि कम से कम उत्तर प्रदेश में सवर्ण वोटों का बंटवारा कराया जाए. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि कांग्रेस से उनकी पार्टी के अच्छे संबंध हैं, लेकिन अंकगणित को देखते हुए उन्होंने यूपी में कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया. तो अखिलेश यादव किस तरह के अंकगणित की बात कर रहे हैं. कहीं उनका इशारा इस तरफ तो नहीं है कि कांग्रेस गठबंधन से बाहर रह कर चुनाव लड़ेगी तो बीजेपी के हिस्से का कुछ सवर्ण वोट काट लेगी. इस तरह यूपी की 80 सीटों पर कांग्रेस बाहर से लड़कर गठबंधन को फायदा पहुंचा देगी. इस मदद के एवज में सपा-बसपा कुछ सीटों पर कमजोर प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस का अहसान चुका देंगीं.

लंबे वक्त तक प्रदेश की सत्ता पर काबिज़ रहने वाली कांग्रेस भी अपनी चुनावी सफलता के लिए अगड़ी जाति के वोटबैंक के समर्थन पर निर्भर करती थी.

कांग्रेस के बाद राज्य की सत्ता क्षेत्रीय पार्टियों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के हाथों में रही. साथ ही यहां वक्त के साथ बीजेपी का भी उभार हुआ. फिलहाल प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी की ही सरकार है.
और उनकी चुनावी सफलता काफी हद तक अगड़ी जाति के वोटबैंक के समर्थन पर निर्भर है.

यूपी के गठबंधन में कांग्रेस के भविष्य को जांचने से पहले जरा सांख्यिकी देख लें. लोकसभा चुनाव 2014 में यूपी में बीजेपी को 42.63 फीसदी, सपा को 22.35 फीसदी, बसपा को 19.77 फीसदी और कांग्रेस को 7.53 फीसदी वोट मिले थे. वहीं विधानसभा 2017 में जब कांग्रेस और सपा साथ आ गए तो बीजेपी को 39.67 फीसदी, सपा को 21.82 फीसदी, कांग्रेस को 6.25 फीसदी और बसपा को 22.23 फीसदी वोट मिले.

इससे पहले मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर साल 1991 और 1993 में बीजेपी उत्तर प्रदेश में सत्ता का स्वाद चख चुकी है.

साल 1996 में बीजेपी ने बहुजन समाज पार्टी के साथ हाथ मिलाया. इसके बाद मायावती के गठबंधन से बाहर जाने पर बीजेपी नरेश अग्रवाल और जगदंबिका पाल के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा बनी.

इस तरह चारों प्रमुख पार्टियां इस फिराक में हैं कि सवर्ण वोटरों को या तो अपनी तरफ खींचा जाए या फिर उनका ऐसा बिखराव हो कि पार्टी को फायदा हो जाए. जब किसी वोटर समूह के साथ पार्टियां ऐसा व्यवहार करती हैं तो उसे वोट बैंक कहा जाता है. इस तरफ 2019 का लोकसभा चुनाव पहली बार सवर्णों को भी प्रभुत्वशाली या डॉमिनेन्ट कास्ट से वोट बैंक वाले वोटर में बदलने वाला साबित हो सकता है.

1996 और 1998 के लोकसभा चुनावों में यानी 11वीं और 12वीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों में अगड़ी जाति के 54 फ़ीसदी वोट बीजेपी को मिले. वहीं 1999 के लोकसभा चुनावों में ये मत प्रतिशत बढ़ कर 63 फ़ीसदी हो गया.

2004 और 2009 के लोसकभा चुनावों में बीजेपी को अगड़ी जाति के 52 फ़ीसदी वोट मिले जबकि 2014 के चुनावों में मत प्रतिशत का ये आंकड़ा बढ़ तक 60 फ़ीसदी तक पहुंचा.

साल 2017 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को मिली सफलता का एक बड़ा कारण अगड़ी जति के वोट हैं क्योंकि इस चुनाव में इस वोटबैंक का 51 फ़ीसदी हिस्सा बीजेपी के साथ था.

तथ्यों के देखते हुए ये कहा जा सकता है कि बीजेपी को 2019 के चुनावों में जीत हासिल करने के लिए प्रदेश की अगड़ी जाति के वोटों की बहुत आवश्यकता है