नक्सलियों से सामना होने पर बंदूक से फूल नहीं गोली ही निकलेगी – बघेल

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत मिलने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के साथ ही नक्सलवाद, बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं से पार पाने की चुनौती है। मुख्यमंत्री ने इन सभी मुद्दों को लेकर विनोद अग्निहोत्री से बातचीत की।

विधानसभा चुनावों में शानदार जीत के बाद लोकसभा चुनावों में क्या उम्मीदें हैं?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने विधानसभा चुनाव में हमें तीन चौथाई बहुमत दिलाया है। अब हमारी जिम्मेदारी है कि लोकसभा चुनाव में उन्हें शत प्रतिशत सीटें तोहफे के रूप में दें।

आपकी सरकार के सामने प्रमुख चुनौतियां क्या हैं?

छत्तीसगढ़ की जनता ने 15 वर्ष बाद कांग्रेस को चुना है तो उनकी अपेक्षाएं भी बहुत हैं। हमें विश्वास है कि जो वादे हमने उनसे किए हैं, हम उन्हें पूरा करेंगे। सरकार बनते ही हमने किसानों की कर्जमाफी का वादा पूरा किया। हमारी सरकार ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1750 रुपये प्रति कुंतल से बढ़ाकर 2500 रुपये करने का फैसला किया। इसी तरह सभी वादों को पूरा किया जाएगा।

किसानों के लिए सरकार क्या स्थायी उपाय कर रही है?

हमने नारा दिया है छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी, नरवा गरवा घुरुवा बारी। किसानों की हालत स्थायी रूप से सुधारने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। सरकार बहुत जल्दी इस लक्ष्य को पूरा कर लेगी। इसमें मनरेगा, कृषि, ग्रामीण विकास, सिंचाई, वन विभाग आदि को जोड़कर योजनाओं को लागू किया जाएगा। इससे सरकार पर कोई अतिरिक्त बोझ भी नहीं होगा।

बेरोजगारी की समस्या कैसे हल करेंगे?

हमारी नीति कृषि क्षेत्र को लाभकारी बनाने और मजबूत करके ज्यादा रोजगार सृजन की है। केवल धान ही नहीं अन्य फसलों, सब्जियों, फलों का उत्पादन बढ़ाना और उससे संबंधित उद्योग लगाने को प्राथमिकता दी जाएगी। छत्तीसगढ़ में वनों में महुआ, चिरौंजी, इमली आदि अनेक फल बहुतायत में पैदा होते हैं। इनके प्रसंस्करण के लिए उद्योग लगाए जाएंगे। जिससे आदिवासियों और अन्य ग्रामीणों को रोजगार मिल सके।

नक्सलवाद से कैसे निबटेंगे?

पिछली सरकार की नीति थी बंदूक का जवाब बंदूक। इसका नतीजा यह हुआ कि तीन ब्लॉक में सीमित नक्सली आज 15 जिलों में फैल गए। जरूरत स्थानीय लोगों का विश्वास हासिल करने की है। हमारी सरकार ने टाटा को उद्योग लगाने के दी गई जमीन किसानों को वापस करने का फैसला किया है। टाटा ने 2016 में सरकार को लिखकर दिया था कि कंपनी वहां उद्योग नहीं लगाएगी। वन अधिकार अधिनियम के तहत सबसे ज्यादा पट्टे छत्तीसगढ़ में निरस्त हुए हैं। जिनके कब्जे 13 दिसंबर 2005 से पहले के हैं उन्हें उनकी जमीन वापस दी जाएगी। तेंदू पत्ते का खरीद मूल्य 2500 रुपए की दर से होती थी, हमने फैसला किया हम 4000 रुपए की दर से खरीदेंगे। सरकार की प्राथमिकता नक्सली प्रभावित इलाकों में स्थानीय जनता का भरोसा जीतने की है। फिर वही लोग बताएंगे कि समस्या का हल कैसे किया जाए।

आरोप है कि आपकी सरकार का रुख नक्सलियों के प्रति नरम है?

जहां गोली की जरूरत होगी, गोली से ही जवाब दिया जाएगा। अगर हमारे जवानों का नक्सलियों से सामना हुआ तो उनकी बंदूकों से गुलाब के फूल नहीं निकलेंगे। लेकिन समस्या का स्थायी निदान तो संवाद ही है।

संवाद का मतलब नक्सलियों से बात करना है?

नक्सलियों से बात करने का सवाल ही नही उठता। नक्सली तो मुट्ठी भर हैं, लेकिन स्थानीय लोग तो लाखों में हैं। हमें उनसे संवाद करना है कि वो क्या चाहते हैं।

फर्जी मुकदमों की जांच के नाम पर समिति को लेकर भी सवाल हैं?

जब कोई घटना घटती है तो पुलिस किसी एक नाम लिखकर साथ में सौ अन्य जोड़ देती है और अन्य के नाम पर किसी को भी उठाकर बंद कर देती है। लोग बिना जांच के बिना सबूत के लंबे समय तक जेलों में बंद रहते हैं। ऐसे मामलों का परीक्षण तो किया जाना चाहिए। इसके लिए कमेटी बनाई जा रही है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, राज्य के पूर्व पुलिस अधिकारी कुछ पदस्थ अधिकारी, अन्य कानूनी विशेषज्ञ शामिल होंगे। कमेटी हर मामले का परीक्षण कर रिपोर्ट देगी। फिर सरकार फैसला करेगी कि किस मामले में क्या करना है।

सरकार बनते ही जांच बिठाना, यह प्रतिशोध की भावना नहीं है?

झीरम घाटी की घटना सामान्य नक्सली हमला नहीं था। नक्सली आम तौर पर विस्फोट करते हैं, गोलीबारी करते हैं और भाग जाते हैं। उस घटना में नंदकुमार पटेल, दिनेश पटेल, महेंद्र वर्मा का नाम पूछकर कि गोली मारी गई। मैंने मामले को विधानसभा में उठाया और पूरे सदन ने भी इसे षड्यंत्र मानते हुए सीबीआई जांच की मांग की थी। हमने अगर एसआईटी गठित की तो क्या गलत किया। नान घोटाले में जिस डायरी के आधार पर 18 सरकारी कर्मचारी जेल में हैं, उस डायरी में कुछ और नाम मिले हैं। इसलिए इसकी भी जांच होनी चाहिए। यह प्रतिशोध की नहीं, न्याय की बात है।

सीबीआई पर पाबंदी और आयुष्मान योजना का विरोध क्या केंद्र से टकराव हैं?

2001 में जब कांग्रेस की सरकार थी तो एक अधिसूचना जारी करके राज्य में कार्रवाई करने का पूरा अधिकार सीबीआई को दिया गया था। 2012 में राज्य में भाजपा सरकार ने सीबीआई के सारे अधिकार वापस ले लिए। इन्होंने पत्र लिखा जिसे भारत सरकार के गजट ने नहीं छापा, लेकिन राज्य के गजट नोटिस में प्रकाशित हो गया। हमने कहा कि जब राज्य के गजट में प्रकाशित हो गया है तो उसे केंद्र की गजट अधिसूचना में भी प्रकाशित कर दिया जाए। फैसला तो भाजपा सरकार का ही था जिसे हम लागू कर रहे हैं। आयुष्मान योजना में बहुत खामियां हैं और वह नाकाम साबित हो रही है।