बौद्ध भिक्षु बनना चाहते हैं तो पहले यह 8 नियमो का करे पालन, हर नियम का है अलग महत्व

भारत देश में कई धर्मो के लोग रहते है। और इन्ही धर्मो की अलग अलग लोगो ने स्थापना की थी। गौतम बुद्ध ही थे, जिन्होंने बौद्ध भिक्षुओं के लिए कुछ नियम तय किए हुए और जिनका मिला-जुला रुप यह था कि बौद्ध भिक्षु का जीवन पूरी तरह से त्याग, वैराग्य और समाधि के आसपास ही रहेगा।आज वेद संसार आपको बताने जा रहा है बौद्ध भिक्षु बनने के खास 8 नियम 
उम्र – जान लें कि कोई भी व्यक्ति अपनी किशोरावस्था में बौद्ध धर्म में भिक्षु का जीवन आसानी से अपना सकता है। यही नहीं, अगर माता-पिता और परिजनों की सहमति हो तो कम उम्र में भी दीक्षा दी जाती है, लेकिन इस बात का खास ध्यान रहें कि किसी भी आयु में बौद्ध भिक्षु बनने के लिए परिवार की सहमति मिलनी बहुत जरुरी होती है।

दीक्षा – याद रखें कि बौद्ध भिक्षु बिना दीक्षा के आप नहीं बन सकते हैं। किसी बौद्ध गुरु से विधिवत दीक्षा के बाद ही सांसारिक रिश्तों और जीवन का त्याग करके आप बौद्ध भिक्षु बना सकते हैं।

महिलाएं – गौरतलब है कि अपने शुरुआती दौर में बौद्ध भिक्षु बौद्ध मठों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर तैयार नहीं हुए थे, क्योंकि यह केवल पुरुषों के लिए था लेकिन समय बीतने के साथ महिलाओं को भी मठों में दीक्षा की अनुमति मिल गई।

भिक्षा से भरण-पोषण – हालांकि बौद्ध भिक्षुओं का भोजन भिक्षा पर ही निर्भर रहता है। कई जगहों पर बौद्ध भिक्षुओं को कोई भी वस्तु खरीदने पर भी पाबंदी है। वह बस उन्हीं चीज़ों का उपयोग कर सकते हैं जो उन्हें दान में मिली हों।

भोजन – बता दें कि कई जगह तो बौद्ध भिक्षुओं के लिए नियम हैं कि वो केवल सुबह के समय ही एक बार ठोस आहार ले सकते हैं और दोपहर से अगले दिन की सुबह तक उन्हें लिक्विड डाइट पर ही रहने की अनुमति होती है।

कपड़े – भोजन के बाद अब कपड़ो की बात करें तो बौद्ध भिक्षु सिर्फ अपने साथ तीन कपड़े ही रख सकते हैं – दो शरीर पर लपेटने के लिए और एक चादर। ध्यान रहें कि यह तीन कपड़े भी किसी के त्यागे हुए या फिर दान किए हुए ही हों क्योंकि बौद्ध भिक्षु खुद कपड़े नहीं खरीद सकते हैं।

ध्यान और समाधि – क्या आप जानते हैं कि बौद्ध भिक्षुओं का सबसे बड़ा नियम क्या होता है… दरअसल, उनका सबसे बड़ा नियम है ध्यान। जी हां, बौद्ध भिक्षु अपनी साधना और समाधि की स्थिति को किसी भी अवस्था में नहीं छोड़ सकते हैं। यही नहीं, ध्यान के जरिए कुंडलिनी जागरण ही उनका सबसे बड़ा उद्देश्य होता है।

परम अवस्था व ध्यान का स्थान – बताते चलें कि ध्यान के जरिए समाधि की प्राप्ति, स्वाध्याय और कुंडलिनी जागरण के जरिए परम अवस्था को प्राप्त करना ही बौद्ध भिक्षुओं का ध्येय होता है। साथ ही बौद्ध भिक्षुओं के प्रशिक्षण काल में उन्हें अलग-अलग वातावरण में भी ध्यान करने का प्रशिक्षण मिलता है जैसे कि – बहुत ठंडे या बहुत गर्म जगह, बहुत सुनसान या बहुत भीड़ वाली जगह। इस तरह अलग-अलग स्थान पर भी बौद्ध भिक्षु अपनी ध्यान की अवस्था का प्रशिक्षण लिया करते हैं।