शहीद थानाध्यक्ष की चिता तो ठंडी हुई पर सुलगने लगे सवाल, जानिए

अपराधियों के साथ मुठभेड़ में अपने प्राणों की आहूति देने वाले जांबाज थानाध्यक्ष आशीष कुमार सिंह की चिता की आग भले ही ठंडी पड़ चुकी हो, लेकिन उनकी शहादत को लेकर उठ रहे सवाल अभी भी सुलग रहे हैं। इस मामले में राज्य पुलिस मुख्यालय से लेकर खगडिय़ा जिला पुलिस बल वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। अपराधियों के साथ मुठभेड़ में अपने प्राणों की आहूति देने वाले जांबाज थानाध्यक्ष आशीष कुमार सिंह की चिता की आग भले ही ठंडी पड़ चुकी हो, लेकिन उनकी शहादत को लेकर उठ रहे सवाल अभी भी सुलग रहे हैं। इस मामले में राज्य पुलिस मुख्यालय से लेकर खगडिय़ा जिला पुलिस बल वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।  सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि दियारा जैसे दुरूह इलाकों में छापेमारी से पहले बिहार पुलिस स्टैंडर्ड ऑपरेडिंग प्रोसिजर (एसओपी) का पालन क्यों नहीं करती?  बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह का कहना है कि परसाहा थानाध्यक्ष आशीष कुमार सिंह को मौजमा दियारा में छापेमारी करने का आदेश तो दे दिया गया, लेकिन छापेमारी से पहले एसओपी के किसी भी प्रावधान का पालन नहीं किया गया। न तो आसपास के थानों को इसकी सूचना थी और न ही दियारा जैसे दुरूह इलाके में छापेमारी के लिए पर्याप्त संसाधन ही उपलब्ध थे।  इतना ही नहीं, ऐसी छापेमारियों में जिले के एसपी तो क्या डीएसपी स्तर के भी किसी अधिकारी को शामिल नहीं किया जाता।   जब जमीन के भीतर से निकलने लगी शराब, देखकर पुलिस के उड़े होश यह भी पढ़ें एसपी साहब अपने एसी कमरे में बैठकर थानेदारों को ऐसी छापेमारियों का आदेश तो दे देते हैं, लेकिन इसके लिए थानेदारों को किस तरह के संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए, इस पर उनका कोई ध्यान नहीं होता। इस तरह की कार्रवाई की पूरी रणनीति थानेदारों को अपने स्तर से तैयार करना होता है।  मृत्युंजय सिंह कहते हैं कि उस इलाके के भौगोलिक स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जहां परसाहा थाना की पुलिस और अपराधियों में मुठभेड़ हुई है, वहां पहुंचने के लिए ट्रैक्टर और घोड़े के अलावा कोई विकल्प नहीं है।  उन्होंने यह भी कहा कि संसाधन के नाम पर थानाध्यक्ष के साथ चार सिपाहियों का बल था। वह भी रात के 12 बजे। थानों को अब तक न तो बुलेटप्रूफ जैकेट उपलब्ध कराए गए हैं और न ही वैसे अत्याधुनिक हथियार, जिससे अपराधी लैस हो चुके हैं।  केवल भवनों की किलेबंदी से प्रभावी नहीं हो सकती पुलिसिंग बिहार के पूर्व डीजीपी डीएन गौतम ने कहा कि केवल पुलिस भवनों की किलेबंदी और उनकी भव्यता से राज्य में पुलिसिंग को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता।  बिहार पुलिस में अभी संसाधनों के साथ प्रशिक्षण का घोर अभाव है।   उपेंद्र कुशवाहा ने NDA को दी राहत और महागठबंधन पर कसा ये तंज, जानिए क्या कहा... यह भी पढ़ें दुरूह इलाकों में छापेमारी, तलाशी और कॉम्बिंग ऑपरेशन के लिए हमारे निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों के पास उच्चस्तरीय प्रशिक्षण का घोर अभाव है। राज्य में एक भी पुलिस प्रशिक्षण संस्थान ऐसे नहीं हैं जहां उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।अपराधियों के साथ मुठभेड़ में अपने प्राणों की आहूति देने वाले जांबाज थानाध्यक्ष आशीष कुमार सिंह की चिता की आग भले ही ठंडी पड़ चुकी हो, लेकिन उनकी शहादत को लेकर उठ रहे सवाल अभी भी सुलग रहे हैं। इस मामले में राज्य पुलिस मुख्यालय से लेकर खगडिय़ा जिला पुलिस बल वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।  सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि दियारा जैसे दुरूह इलाकों में छापेमारी से पहले बिहार पुलिस स्टैंडर्ड ऑपरेडिंग प्रोसिजर (एसओपी) का पालन क्यों नहीं करती?  बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह का कहना है कि परसाहा थानाध्यक्ष आशीष कुमार सिंह को मौजमा दियारा में छापेमारी करने का आदेश तो दे दिया गया, लेकिन छापेमारी से पहले एसओपी के किसी भी प्रावधान का पालन नहीं किया गया। न तो आसपास के थानों को इसकी सूचना थी और न ही दियारा जैसे दुरूह इलाके में छापेमारी के लिए पर्याप्त संसाधन ही उपलब्ध थे।  इतना ही नहीं, ऐसी छापेमारियों में जिले के एसपी तो क्या डीएसपी स्तर के भी किसी अधिकारी को शामिल नहीं किया जाता।   जब जमीन के भीतर से निकलने लगी शराब, देखकर पुलिस के उड़े होश यह भी पढ़ें एसपी साहब अपने एसी कमरे में बैठकर थानेदारों को ऐसी छापेमारियों का आदेश तो दे देते हैं, लेकिन इसके लिए थानेदारों को किस तरह के संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए, इस पर उनका कोई ध्यान नहीं होता। इस तरह की कार्रवाई की पूरी रणनीति थानेदारों को अपने स्तर से तैयार करना होता है।  मृत्युंजय सिंह कहते हैं कि उस इलाके के भौगोलिक स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जहां परसाहा थाना की पुलिस और अपराधियों में मुठभेड़ हुई है, वहां पहुंचने के लिए ट्रैक्टर और घोड़े के अलावा कोई विकल्प नहीं है।  उन्होंने यह भी कहा कि संसाधन के नाम पर थानाध्यक्ष के साथ चार सिपाहियों का बल था। वह भी रात के 12 बजे। थानों को अब तक न तो बुलेटप्रूफ जैकेट उपलब्ध कराए गए हैं और न ही वैसे अत्याधुनिक हथियार, जिससे अपराधी लैस हो चुके हैं।  केवल भवनों की किलेबंदी से प्रभावी नहीं हो सकती पुलिसिंग बिहार के पूर्व डीजीपी डीएन गौतम ने कहा कि केवल पुलिस भवनों की किलेबंदी और उनकी भव्यता से राज्य में पुलिसिंग को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता।  बिहार पुलिस में अभी संसाधनों के साथ प्रशिक्षण का घोर अभाव है।   उपेंद्र कुशवाहा ने NDA को दी राहत और महागठबंधन पर कसा ये तंज, जानिए क्या कहा... यह भी पढ़ें दुरूह इलाकों में छापेमारी, तलाशी और कॉम्बिंग ऑपरेशन के लिए हमारे निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों के पास उच्चस्तरीय प्रशिक्षण का घोर अभाव है। राज्य में एक भी पुलिस प्रशिक्षण संस्थान ऐसे नहीं हैं जहां उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।

सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि दियारा जैसे दुरूह इलाकों में छापेमारी से पहले बिहार पुलिस स्टैंडर्ड ऑपरेडिंग प्रोसिजर (एसओपी) का पालन क्यों नहीं करती?

बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह का कहना है कि परसाहा थानाध्यक्ष आशीष कुमार सिंह को मौजमा दियारा में छापेमारी करने का आदेश तो दे दिया गया, लेकिन छापेमारी से पहले एसओपी के किसी भी प्रावधान का पालन नहीं किया गया। न तो आसपास के थानों को इसकी सूचना थी और न ही दियारा जैसे दुरूह इलाके में छापेमारी के लिए पर्याप्त संसाधन ही उपलब्ध थे।

इतना ही नहीं, ऐसी छापेमारियों में जिले के एसपी तो क्या डीएसपी स्तर के भी किसी अधिकारी को शामिल नहीं किया जाता।

एसपी साहब अपने एसी कमरे में बैठकर थानेदारों को ऐसी छापेमारियों का आदेश तो दे देते हैं, लेकिन इसके लिए थानेदारों को किस तरह के संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए, इस पर उनका कोई ध्यान नहीं होता। इस तरह की कार्रवाई की पूरी रणनीति थानेदारों को अपने स्तर से तैयार करना होता है।

मृत्युंजय सिंह कहते हैं कि उस इलाके के भौगोलिक स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जहां परसाहा थाना की पुलिस और अपराधियों में मुठभेड़ हुई है, वहां पहुंचने के लिए ट्रैक्टर और घोड़े के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि संसाधन के नाम पर थानाध्यक्ष के साथ चार सिपाहियों का बल था। वह भी रात के 12 बजे। थानों को अब तक न तो बुलेटप्रूफ जैकेट उपलब्ध कराए गए हैं और न ही वैसे अत्याधुनिक हथियार, जिससे अपराधी लैस हो चुके हैं।

केवल भवनों की किलेबंदी से प्रभावी नहीं हो सकती पुलिसिंग बिहार के पूर्व डीजीपी डीएन गौतम ने कहा कि केवल पुलिस भवनों की किलेबंदी और उनकी भव्यता से राज्य में पुलिसिंग को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता।  बिहार पुलिस में अभी संसाधनों के साथ प्रशिक्षण का घोर अभाव है।

दुरूह इलाकों में छापेमारी, तलाशी और कॉम्बिंग ऑपरेशन के लिए हमारे निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों के पास उच्चस्तरीय प्रशिक्षण का घोर अभाव है। राज्य में एक भी पुलिस प्रशिक्षण संस्थान ऐसे नहीं हैं जहां उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।