
लाला हर दयाल (14 अक्टूबर, 1884 – 4 मार्च, 1939) एक राष्ट्रवादी थे जिन्होंने अमेरिका में गदर पार्टी की स्थापना की थी. वह एक ज्ञानी व्यक्ति थे, जिन्होंने भारतीय सिविल सेवा से अपना करियर शुरू किया था. उनके साधारण जीवन और बौद्धिक कौशल से कनाडा और यूएसए में रहने वाले कई प्रवासी भारतीयों प्रेरित हुए थे. हरदायल का विवाह सुंदर रानी से हुआ था, उनका बेटे की मृत्यु शैशव अवस्था में ही हो गई थी, जिसके बाद उनकी बेटी शांति 1908 में पैदा हुईं, हर दयाल के परिवार का बलिदान बहुत बड़ा था, उनकी पत्नी ने अपना पूरा जीवन हरदयाल से अलग रहकर बिताया, क्योंकि हरदयाल स्वतंत्रता आंदोलन में लगे थे. यहाँ तक की उनकी बेटी ने भी अपने जीवनकाल में पिता को कभी नहीं देखा. 
उन्हें संस्कृत से भी बहुत लगाव था, वे कहते थे कुछ लोग कहते हैं कि संस्कृत एक मृत भाषा है और इसे आमतौर पर राष्ट्रीय व्यापार के उद्देश्य के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता, यह विचार पूरी तरह से गलत है. एक हिंदू के लिए अंग्रेजी सीखने से संस्कृत सीखना आसान है. संस्कृत मृत नहीं है, यह हम हैं जो मर चुके हैं. जो लोग भारत को महान और संयुक्त राष्ट्र बनाना चाहते हैं उन्हें भारतीय लोगों की शाश्वत शरण और महिमा के रूप में संस्कृत को अपनाना चाहिए.
लाला हरदायल के आखिरी साल काफी रहस्यमयी तरीके से गुजरे और उनकी मृत्यु भी रहस्यमय रही. 4 मार्च, 1939 को अमेरिका के फिलाडेल्फिया में उनकी मृत्यु हो गई. उनकी मृत्यु की शाम को उन्होंने सामान्य रूप से एक व्याख्यान दिया जहां उन्होंने कहा था “मैं सभी के साथ अमन से हूं”. लाला हरदायल के बहुत करीबी दोस्त और भारत माता सोसाइटी के संस्थापक सदस्य लाला हनुमंत सहाय ने मृत्यु को प्राकृतिक रूप से स्वीकार नहीं किया, उन्होंने संदेह जताया था कि लाला को ज़हर देकर मारा गया है, लेकिन उस वक़्त किसी भी तरह कि जांच नहीं कि गई और भारत माता का एक और सपूत मातृभूमि पर शहीद हो गया.