
शहर के पुरानी बस्ती, गांधी चौक निवासी 94 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा महात्मा गांधी का जिक्र करते ही माथे पर बल देते हुए पुरानी यादों में खो जाते हैं। वे बताते हैं कि साल तो याद नहीं, लेकिन बापू छत्तीसगढ़ प्रवास के समय रायपुर से महासमुंद आ रहे थे।
नगर के वर्तमान गांधी चौक (पुरानी बस्ती) में सभा होनी थी। उस समय मैं कक्षा चौथी में था। उम्र तकरीबन 11 वर्ष रही होगी। बापू के स्वागत के लिए स्कूल की पूरी टाटपट्टी इकठ्ठा की गई। तय किया गया कि महासमुंद रेलवे स्टेशन से नगर के चौराहे तक पूरे एक किलोमीटर तक जैसे-जैसे बापू पैदल आगे बढ़ेंगे, वे उनका पैर जमीन पर नहीं पड़ने देंगे।
हमारी मित्र मंडली सुबह-सुबह महासमुंद रेलवे स्टेशन पहुंच गई थी। स्टेशन से बाहर आते ही बापू ने जब चलना शुरू किया, टाटपट्टी बिछाने के लिए हमें उनके सामने-सामने दौड़ लगानी पड़ रही थी। चौराहे तक पहुंचते-पहुंचते हमारी पूरी मित्र मंडली पसीने से नहा उठी थी।
पंडित शर्मा बताते हैं कि उस समय मैं बृजराज पाठशाला में कक्षा चौथी का छात्र था। एक जुनून-सा था, क्या करें देश के लिए। खेलने की उम्र में देश की चिंता शुरू हो गई थी। एक दिन स्कूल गए तो पता चला कि महात्मा गांधी आ रहे हैं।
हम बापू को न जानते थे, न पहचानते थे। हमारे गुरुजी प्यारेलाल क्षेत्रपाल ने कहा कि क्रांति के दूत आ रहे हैं। बस फिर क्या था, मानो जैसे पंख लग गए हों। बापू का टाटपट्टी बिछाते हुए स्वागत करना हमारे लिए किसी खेल की तरह था।
मैं, अमृतलाल, बाबू भाई, साव जी भाई, नारायण, रामलाल, सरजू, विष्णु, दिवाकर समेत अन्य मित्र सुबह-सुबह टाटपट्टी लेकर रेलवे स्टेशन पहुंच गए। उस समय रायपुर-विशाखपटनम मार्ग पर जो ट्रेन चलती थी, उसे डाक गाड़ी कहते थे। गाड़ी आई। बाहर भीड़ के बीच टाटपट्टी लिए हम भी खड़े थे।
बाहर आते ही उन्होंने बच्चों की टोली को झंडा थमा दिया। सूत की माला पहनाकर बापू का स्वागत हुआ। गुरुजी के सिखाए अनुसार गांधीजी की जय, अंग्रेज भगाओ-देश बचाओ की नारेबाजी शुरू हो गई। इसके बाद बापू ने जिस तेजी से चलना शुरू किया, हम लोगों की तो हालत ही खराब हो गई।
नगर के श्रीश्रीमाल चौक (अब गांधी चौक) में उन्होंने आजादी के आंदोलन से जुड़ा भाषण दिया। हम छोटे थे, क्या कहा ठीक से याद नहीं। भाषण के बाद जंगल तमोरा अथवा कंडेल (धमतरी) कहां के लिए रवाना हुए थे, बताना मुश्किल है। दो साल बाद वे फिर महासमुंद आए थे।
महात्मा गांधी से प्रभावित होकर बनाई थी वानर सेना
गांधी जी के व्यक्तित्व से प्रभावित बच्चों का एक दल बनाया था, जिसे वानर सेना नाम दिया था। यतियतनलाल जी इसके संचालक थे। हम लोग पोस्टर और झंडे बांटते थे। इसके लिए हमें पिपरमेंट आदि देकर प्रोत्साहित किया जाता था।
कुछ समय बाद पुलिस ने प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। हमें पकड़कर शहर से तीन-चार किलोमीटर दूर निर्जन रास्ते में छोड़ आते थे। पैदल घर लौटते-लौटते थक जाते थे। लेकिन दूसरे दिन फिर उसी उत्साह से अपने काम में लग जाते थे। लड़कपन के उस उत्साह और देशभक्ति से भरे जोश को भूल नहीं सकते।