
बिहार में आठ साल के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) वन के शासनकाल में जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच जमीनी स्तर पर जैसी एकजुटता दिखाई देती थी वैसा राजग टू के 15 महीने के दूसरे कार्यकाल में नहीं दिखाई दे रही है। एकजुटता और समन्वय की कमी का असर प्रशासनिक तंत्र और कार्यकर्ताओं के स्तर पर भी पड़ता दिख रहा है।
जंगलराज के विरोध में हुआ गठन
बिहार में भाजपा और जदयू के बीच 1996 के लोकसभा चुनाव में सीटों का तालमेल हो गया था। तब तक राज्य में चारा और अलकतरा जैसे घोटाले उजागर हो गए थे। दोनों दलों के नेता साझा तरीके से लालू-राबड़ी जंगलराज के खिलाफ अदालत से लेकर सड़क तक आंदोलन में उतर चुके थे।
इसी बीच मई 1998 में राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का गठन हुआ। समता पार्टी भी गठबंधन में शामिल हो गई। अटल बिहार वाजपेयी अध्यक्ष और जार्ज फर्नांडीस इसके संयोजक बने। तब से 24 नवंबर 2005 को नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में राजग सरकार बनने तक दोनों दलों ने मिलकर लालू-राबड़ी के कुशासन के खिलाफ ऐसा सशक्त आंदोलन चलाया, जिसको देखने से लगता ही नहीं था कि यह दो दलों का साझा आंदोलन है।
भाजपा-जदयू में दिखा अद्भुत समन्वय
मामला नीतीश कुमार का 2000 के विधानसभा चुनाव के बाद सात दिनों के लिए मुख्यमंत्री बनने का रहा हो या मार्च 2005 के विधानसभा चुनाव के लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) विधायक दल तोडऩे का प्रयास, या फिर लालू प्रसाद के दबाव में आधी रात को विधान सभा को भंग कर बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने की घोषणा के विरोध का मामला ही क्यों न हो, दोनों दलों के बीच अद्भुत समन्वय दिखाई देता था।
बिहार में जनादेश का उल्लंघन कर राष्ट्रपति शासन थोपे जाने के विरोध में नीतीश कुमार ने जब चंपारण से न्याय यात्रा की शुरूआत की तो इसकी पूरी रणनीति भाजपा नेता अरूण जेटली ने तैयार की। दोनों दलों के नेता इस न्याय यात्रा में शामिल रहे। संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस होती थी।
तय किए सुशासन के साझा कार्यक्रम
2005 में जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में राजग की सरकार बनी तो दोनों दलों ने विवादास्पद मामलों को छोड़कर सुशासन के कार्यक्रम तय किए। सरकार के स्तर पर तो पूर्ण तालमेल था ही पार्टी के स्तर पर भी यह साफ दिखता था। नीतीश कुमार बिहार राजग के अध्यक्ष और नंदकिशोर यादव संयोजक के तौर पर कार्य करते रहे। सरकार के एक साल पूरा होने पर सरकारी कार्यक्रम हुआ। इसके तुरंत बाद बेली रोड स्थित कार्यालय में कार्यकताओं के लिए अलग कार्यक्रम किया गया। यह सिलसिला 2013 में जदयू के राजग से नाता तोडऩे तक चलता रहा।
राजग के दूसरे काल में नहीं पहले वाली बात
लेकिन, जुलाई 2017 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में दुबारा राजग सरकार के गठन के बाद ऐसा समन्वय देखने को नहीं मिल रहा है। नेता चुने जाने के बाद पंद्रह महीने में शायद ही कभी राजग विधायक दल की बैठक हुई है। संयोजक तो अब कोई है ही नहीं। पहले की तरह प्रमंडल और जिला स्तर पर बैठक की कौन कहे, चार घटक दलों के शीर्ष नेताओं की एक बार बैठक तक नहीं हुई है।
समन्वय की कमी से बोर्ड-कमेटियों के पद खाली
समन्वय की कमी के चलते ही बोर्ड और निगमों के पद नहीं भरे जा सके। बीस सूत्री कमेटियों का गठन नहीं हो सका है। जिला से लेकर हाई कोर्ट तक लोक अभियोजकों की नियुक्ति नहीं हो सकी है। अब तो स्थिति यह है कि राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा राज्य में हिंसा और अपराध की घटनाओं पर विपक्ष से भी ज्यादा कड़े तेवर दिखा रहे हैं।