
पिता के रूप में धीर गंभीर तो दूजे ही पल ममत्व की मूर्ति। कुछ ही क्षण बाद बेटे की भूमिका के साथ न्याय करते नजर आना। पल में डॉक्टर तो पल में प्रोफेसर और सरकारी अधिकारी बन जाना। देखते ही देखते भिखारी के याचना भरे शब्दों का सुरक्षाकर्मी के सख्त लहजे में बदल जाना…। ये अभिनय कौशल है, जिससे एक नाटक के अंदर एक कलाकार कई किरदारों में बखूबी ढल जाता है।
रंगकर्म प्रेमियों को बदलती वेशभूषा के साथ पल-पल बदलता हाव-भाव भाता है। शहर में रंगकर्मियों की एकल प्रस्तुतियां खास रही हैं। सटीक लेखन और निर्देशन को अभिनय का साथ मिला और एक उम्दा नाटक तैयार हो गया। रंगमंच के दिग्गज के साथ ही नवांकुर भी एकल प्रस्तुतियों के लिए अभ्यासरत रहते हैं।
एक घंटा 20 मिनट और पांच रोल
नाटक : मॉडल विहार
लेखन-निर्देशन-अभिनय : ललित सिंह पोखरिया
किरदार : डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर, सरकारी विभाग का अधिकारी और ट्रैवल एजेंसी संचालक।
2007 में पहली बार आया नाटक ‘मॉडल विहार’ अब तक सात बार मंचित हो चुका है। अलग-अलग मंचों पर हर बार दर्शकों का बेशुमार प्यार मिला है। लेखन और निर्देशन के साथ वरिष्ठ रंगकर्मी ललित सिंह पोखरिया ने उम्दा अभिनय कौशल का परिचय दिया। स’चाई और ईमानदारी का मुखौटा लगाए हुए सभ्य, शिक्षित और सुसंस्कृत समझे जाने वाले उ’च वर्ग के कुछ स्वार्थी, बेईमान, कुटिल और धूर्त लोगों पर आधारित हास्य-व्यंग्य रंगकर्म की हर कसौटी पर खरा उतरा। ललित सिंह पोखरिया ने आधे घंटे में डॉक्टर, वकील और प्रोफेसर समेत पांच किरदारों के साथ न्याय किया। वेशभूषा के साथ पल-पल बदलते हाव-भाव और संवाद में उतार-चढ़ाव को रंगमंच प्रेमियों ने हर बार करतल ध्वनि से सराहा। 20-25 दिन की मेहनत के बाद यह सफल नाटक तैयार हुआ। ललित पोखरिया कहते हैं, नाटक खुद लिखा था, इसलिए किरदारों को समझने और अभिनय में आसानी हुई। हर किरदार को मनोवैज्ञानिक तरीके से समझते हुए उसके वाचिक और आंगिग को भिन्न रूप से दर्शाना चुनौतीपूर्ण रहता है।
29 सितंबर को देखिए अभिनय कौशल
नाटक : थीफ पुलिस
लेखक : विजय तेंदुलकर
अभिनय : शुभम पांडेय (स्टेज मैनेजर, भिखारी, पति, चाय वाला और गार्ड के रोल में)
16 वर्षों से रंगमंच में सक्रिय युवा रंगकर्मी शुभम पांडेय 29 सितंबर को मंचित होने वाले नाटक ‘थीफ पुलिस’ में पांच किरदारों के साथ दर्शकों के सामने होंगे। राय उमा नाथ बली प्रेक्षागृह में मंचित होने वाले नाटक में शुभम स्टेज मैनेजर, भिखारी, पति, चाय वाला, गार्ड की भूमिका में होंगे। शुभम बताते हैं, इससे पहले नाटक ‘सम्राट अशोक’ और नाटक ‘ललई सिंह यादव’ में बतौर सूत्रधार कई पात्रों के बारे में अभिनय करके बताने का मौका मिला। एक साथ एक ही नाटक में कई शेड करने में जिम्मेदारी ज्यादा होती है पर अनुभव भी उम्दा होता है।
शुभम भारतेंदु नाट्य अकादमी रंगमंडल से जुड़े रहे। रंगमंच के साथ ही टीवी सीरियल और फिल्मों में भी काम कर चुके हैं। दर्पण संस्था से अपने रंगमंच के सफर की शुरुआत की। पीयूष पांडेय के निर्देशन में पहले नाटक ‘क्रांति और काकोरी’ से शुरुआत करने वाले शुभम अब तक 70 नाटकों में अभिनय कर चुके हैं, जिसमें 46 नाटकों में मुख्य भूमिका रही है। अभिनय के साथ लेखन और निर्देशन भी करते हैं।
एकल प्रस्तुतियों ने दिलाया नाम
नाटक : ज़ू ज़ू ज़ू (एक ही कहानी के अंदर पति-पत्नी, मेजर और नौकर के भावों को समेटना) और संक्रमण (बाप, बेटा और मां)
अभिनय : सोमेंद्र प्रताप सिंह
रंगमंच से जुड़े महज चार साल में ही सोमेंद्र प्रताप सिंह ने दो नाटकों में एकल प्रस्तुति से उम्दा अभिनय कौशल का परिचय दिया है। 2017 में नाटक ‘जू जू जू’ में एक ही कहानी के अंदर पति-पत्नी, मेजर और नौकर के भावों को बखूबी समेटा। वहीं हाल ही में मंचित नाटक संक्रमण में बाप, बेटा और मां के किरदारों को उम्दा तरीके से निभाया।
सीतापुर रोड निवासी सोमेंद्र प्रताप सिंह ने भारतेंदु नाट्य अकादमी के रंग मंडल में रहकर अभिनय की बारीकियां जानीं। चित्रा जी के निर्देशक में तीन नाटक ‘अमृत रंग’, ‘लौह जगी आजादी की’ और ‘महानिर्वाण’ किया। शहर के बाहर भी रंगमंच की दुनिया से जुड़े रहे। ‘कांचघर’, ‘प्यारे मोहन की अनोखी दुनिया’, ‘कांचघर-2Ó, ‘मुझे अमृता चाहिए’ आदि कई नाटक किए। ‘ज़ू ज़ू जू’ और ‘संक्रमण’ में एकल प्रस्तुतियों ने खास नाम दिलाया।
ये अभिनय नहीं आसान…
- एक ही नाटक के अंदर कई किरदारों को निभाने में विविधता सबसे बड़ी चुनौती होती है। वेरिएशन का विशेष ध्यान रखता होता है।
- सिर्फ अलग-अलग रोल समझकर न करें। हर किरदार के साथ वैचारिक और भावनात्मक दृष्टि से जुड़ेंगे तो वह सही ढंग से स्थापित हो सकेगा।
- वाचिक पक्ष का खास ख्याल।
- शारीरिक फुर्ती और लचीलापन जरूरी होता है। अलग-अलग उम्र के हिसाब से किरदारों के भाव पकडऩे के लिए अ’छी तैयारी की जरूरत होती है।