आधार की राह में कम नहीं चुनौतियां, काले धन पर नियंत्रण की उम्मीद

उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के फैसले से आधार कार्ड की संवैधानिकता पर मुहर लग गई है। इस पीठ के चार न्यायाधीशों (मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा समेत) ने अपने फैसलों में आधार कार्ड को संवैधानिक बताया, वहीं न्यायाधीश डीवाइ चंद्रचूड़ ने इसे संवैधानिक मापदंडों पर खरा नहीं पाया। बहुमत न्यायाधीशों की पीठ ने आधार कार्ड को यूनिक पहचान का आधार बताया और कहा कि यह देश के गरीब वंचित आबादी के लिए उनका सम्मान और पहचान है।उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के फैसले से आधार कार्ड की संवैधानिकता पर मुहर लग गई है। इस पीठ के चार न्यायाधीशों (मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा समेत) ने अपने फैसलों में आधार कार्ड को संवैधानिक बताया, वहीं न्यायाधीश डीवाइ चंद्रचूड़ ने इसे संवैधानिक मापदंडों पर खरा नहीं पाया। बहुमत न्यायाधीशों की पीठ ने आधार कार्ड को यूनिक पहचान का आधार बताया और कहा कि यह देश के गरीब वंचित आबादी के लिए उनका सम्मान और पहचान है।  इन चार न्यायाधीशों ने पैन कार्ड और सरकार की कल्याणकारी सेवा से जुड़ी योजनाओं में आधार को पहचान के लिए तर्कसंगत माना है, लेकिन यह भी कहा कि सरकारी सुविधाओं से किसी भी जरूरतमंद को वंचित नहीं किया जा सकता है। इन चार न्यायाधीशों की पीठ ने आधार कार्ड अधिनियम 2016 की धारा 57 को असंवैधानिक करार देते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकार और निजता में राज्य, निजी और व्यक्तिगत सेवा प्रदाताओं के दखल व उनके डेटा में सेंध पर अंकुश लगाने का काम किया है। इस फैसले के बाद से मोबाइल फोन का सिम लेने के लिए आधार पहचान के तौर पर देना अनिवार्य नहीं रहेगा। कोई भी संस्थान किसी भी तरह की पहचान के लिए आधार डाटा के लिए विवश नहीं कर सकेगा।   गांधीवादी तरीके से अब लड़ी जाएगी नक्‍सलियों के खिलाफ जंग यह भी पढ़ें   बहुमत पीठ ने धारा 47 में भी सरकार को संशोधन करने के लिए आदेश दिया है। इस धारा के अनुसार अगर आधार डेटा लीक या दुरुपयोग होता है तो अपराध की शिकायत केवल आधार प्राधिकरण ही कर सकता है, लेकिन अब उच्चतम न्यायालय ने साफ कर दिया है कि सरकार नागरिक या पीड़ित व्यक्ति को भी आपराधिक शिकायत दर्ज करने के लिए सक्षम बनाने वाला संशोधन लाएगी। न्यायालय ने धारा 33 (2) को भी असंवैधानिक घोषित करते हुए सरकार से उसमें बदलाव करने को कहा है। न्यायालय ने धारा 29 के बाबत कहा है कि अगर यह धारा सरकार को आधार की सूचना साझा करने का अधिकार देती है तो निजता के अधिकार के तहत नागरिकों को इसे न्यायालय में चुनौती देने का अधिकार है। आधार अधिनियम की धारा 27 के अनुसार आधार डाटा को पांच साल तक आर्काइव करने के प्रावधान को उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया है और कहा है कि इसे छह महीने से ज्यादा समय तक नहीं रिकार्ड में नहीं रखना चाहिए। न्यायालय की इस बहुमत पीठ ने यह भी कहा कहा कि सरकार सुनिश्चित करे कि आधार कार्ड किसी भी गैर-कानूनी अप्रवासी को जारी न हो।   PM के नाम पर VIP सुविधा लेने वाला कथक सम्राट गिरफ्तार, राष्ट्रपति ने किया था सम्मानित यह भी पढ़ें न्यायाधीशों की बहुमत पीठ ने यह मानने से इन्कार किया है कि धन विधेयक के रूप में पेश किए जाने के आधार पर, आधार अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस अधिनियम से ऐसा कुछ भी नया नहीं होने जा रहा कि देश को सरकारी निगरानी में रखने की योजना चल रही है। न्यायालय ने देशभर की महत्वपूर्ण परीक्षाओं में भी आधार की अनिवार्यता लागू करने की मंशा को झटका दिया है।     फिर हैकर्स के हाथ लगा फेसबुक के 5 करोड़ यूजर्स का डाटा, जानिए कैसे हुआ ये 'कारनामा' यह भी पढ़ें आधार कार्ड की संवैधानिकता को लेकर चार न्यायाधीशों के बहुमत फैसले के बाद न्यायाधीश चंद्रचूड़ की असहमति का कोई तात्कालिक प्रभाव भले ही न हो, लेकिन उनकी असहमति नागरिकों के मौलिक अधिकारों, निजता के हक व तकनीक बनाम मानवीय पक्षों पर एक जिम्मेदार टिप्पणी के रूप में दर्ज होगा जो भविष्य में इस तरह के मुद्दों पर न्यायिक बहसों को एक नया आधार प्रदान करेगा।  न्यायाधीश चंद्रचूड़ के अल्पमत निर्णय में दो बातें बारीकी से कही गई हैं, पहला यह कि आधार विधेयक को धन विधेयक के रूप में पास कराना संविधान के साथ धोखा है और दूसरा तकनीकी बदलाव और हेरफेर के जरिये संवैधानिक सुरक्षा की गारंटी से समझौता नहीं किया जा सकता है। न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि लोकसभा अध्यक्ष का किसी बिल को धन विधेयक का दर्जा देना न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है, क्योंकि देश के संसद के बड़े भाग राज्यसभा को मताधिकार से वंचित कर दिया गया और इसे संविधान की आत्मा के साथ धोखा ही कहा जाएगा। यह संविधान के ऊपर राजनीतिक सत्ता के प्रभुत्व स्थापित करने का मामला है।   कर्मचारियों ने पूरे किए 25 साल, मालिक ने गिफ्ट में दी मर्सिडीज कार यह भी पढ़ें न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि आधार अधिनियम की धारा 57 संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का अतिक्रमण करती है। यह भी स्पष्ट किया कि अनौपचारिक निजता और डाटा को सार्वजनिक करने का अधिनियम लाना नागरिकों पर एक सरकारी निगरानी तंत्र बैठाने जैसा ही है। न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने सरकार की मंशा पर भी सवाल किया और कहा कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय के कई अंतरिम आदेशों का अपने राजनीतिक एजेंडे के तहत उल्लंघन किया है और देश के करोड़ों लोगों का डाटा और सूचना गलत तरीके से तीसरे पक्ष को हस्तांतरित हो जाने दिया है। उन्होंने कहा है कि आधार डाटा  सुरक्षित नहीं है और यह देश के नागरिकों की निजता और स्वतंत्रता के साथ देश की व्यवस्था के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है। इस तरह से आधार पर फैसला भले ही आ गया हो, लेकिन इस पर बहस अभी भी बाकी है।     मध्य प्रदेश के दमोह की मलिन बस्ती में गांधी जी ने रखी थी गुरुद्वारे की नींव यह भी पढ़ें न्यायाधीश चंद्रचूड़ के फैसले से संकेत मिलता है कि आधार पर कानूनी लड़ाई शायद आगे भी जारी रहेगी। उच्चतम न्यायालय के मौजूदा फैसले से इतना तो साफ हो गया है कि सरकार देश के व्यापक हित से जुड़े मसलों में कुछ प्रक्रियाओं के तहत सूचना ले सकती है, लेकिन नागरिकों के साथ निगरानी एजेंसी जैसा बर्ताव नहीं कर सकती है। इस फैसले के बाद सरकार को आधार अधिनियम में कई संशोधन करने पड़ेंगे। धन विधेयक के मसले पर सवालों का सामना करना पड़ेगा और चंद्रचूड़ के अल्पमत फैसले में उठाए गए संवैधानिक पहलुओं पर भी जवाब देना होगा। हो सकता है कि यह मामला एक बार फिर से उच्चतम न्यायालय में जाए और इसकी संवैधानिकता की समीक्षा कोई और बड़ी संवैधानिक पीठ करे। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है कि बहस और तर्क की गुंजाइश हमेशा बनी रहे और एक बेहतर व्यवस्था की दिशा में समाज आगे बढ़ता रहे।  सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आधार पर बड़ा फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि कहां यह जरूरी होगा और कहां नहीं। फैसला देने वाले पांच न्यायाधीशों की पीठ में शामिल एक न्यायाधीश डीवाइ चंद्रचूड़ ने इसके कई पहलुओं के प्रति अपनी असहमति व्यक्त की है। आधार डाटा की सुरक्षा और उसके दुरुपयोग पर गाहेबगाहे उठते सवालों को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में इससे नए तरह के बहस की शुरुआत हो सकती है।

इन चार न्यायाधीशों ने पैन कार्ड और सरकार की कल्याणकारी सेवा से जुड़ी योजनाओं में आधार को पहचान के लिए तर्कसंगत माना है, लेकिन यह भी कहा कि सरकारी सुविधाओं से किसी भी जरूरतमंद को वंचित नहीं किया जा सकता है। इन चार न्यायाधीशों की पीठ ने आधार कार्ड अधिनियम 2016 की धारा 57 को असंवैधानिक करार देते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकार और निजता में राज्य, निजी और व्यक्तिगत सेवा प्रदाताओं के दखल व उनके डेटा में सेंध पर अंकुश लगाने का काम किया है। इस फैसले के बाद से मोबाइल फोन का सिम लेने के लिए आधार पहचान के तौर पर देना अनिवार्य नहीं रहेगा। कोई भी संस्थान किसी भी तरह की पहचान के लिए आधार डाटा के लिए विवश नहीं कर सकेगा।

बहुमत पीठ ने धारा 47 में भी सरकार को संशोधन करने के लिए आदेश दिया है। इस धारा के अनुसार अगर आधार डेटा लीक या दुरुपयोग होता है तो अपराध की शिकायत केवल आधार प्राधिकरण ही कर सकता है, लेकिन अब उच्चतम न्यायालय ने साफ कर दिया है कि सरकार नागरिक या पीड़ित व्यक्ति को भी आपराधिक शिकायत दर्ज करने के लिए सक्षम बनाने वाला संशोधन लाएगी। न्यायालय ने धारा 33 (2) को भी असंवैधानिक घोषित करते हुए सरकार से उसमें बदलाव करने को कहा है। न्यायालय ने धारा 29 के बाबत कहा है कि अगर यह धारा सरकार को आधार की सूचना साझा करने का अधिकार देती है तो निजता के अधिकार के तहत नागरिकों को इसे न्यायालय में चुनौती देने का अधिकार है। आधार अधिनियम की धारा 27 के अनुसार आधार डाटा को पांच साल तक आर्काइव करने के प्रावधान को उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया है और कहा है कि इसे छह महीने से ज्यादा समय तक नहीं रिकार्ड में नहीं रखना चाहिए। न्यायालय की इस बहुमत पीठ ने यह भी कहा कहा कि सरकार सुनिश्चित करे कि आधार कार्ड किसी भी गैर-कानूनी अप्रवासी को जारी न हो।

न्यायाधीशों की बहुमत पीठ ने यह मानने से इन्कार किया है कि धन विधेयक के रूप में पेश किए जाने के आधार पर, आधार अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस अधिनियम से ऐसा कुछ भी नया नहीं होने जा रहा कि देश को सरकारी निगरानी में रखने की योजना चल रही है। न्यायालय ने देशभर की महत्वपूर्ण परीक्षाओं में भी आधार की अनिवार्यता लागू करने की मंशा को झटका दिया है।

आधार कार्ड की संवैधानिकता को लेकर चार न्यायाधीशों के बहुमत फैसले के बाद न्यायाधीश चंद्रचूड़ की असहमति का कोई तात्कालिक प्रभाव भले ही न हो, लेकिन उनकी असहमति नागरिकों के मौलिक अधिकारों, निजता के हक व तकनीक बनाम मानवीय पक्षों पर एक जिम्मेदार टिप्पणी के रूप में दर्ज होगा जो भविष्य में इस तरह के मुद्दों पर न्यायिक बहसों को एक नया आधार प्रदान करेगा।

न्यायाधीश चंद्रचूड़ के अल्पमत निर्णय में दो बातें बारीकी से कही गई हैं, पहला यह कि आधार विधेयक को धन विधेयक के रूप में पास कराना संविधान के साथ धोखा है और दूसरा तकनीकी बदलाव और हेरफेर के जरिये संवैधानिक सुरक्षा की गारंटी से समझौता नहीं किया जा सकता है। न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि लोकसभा अध्यक्ष का किसी बिल को धन विधेयक का दर्जा देना न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है, क्योंकि देश के संसद के बड़े भाग राज्यसभा को मताधिकार से वंचित कर दिया गया और इसे संविधान की आत्मा के साथ धोखा ही कहा जाएगा। यह संविधान के ऊपर राजनीतिक सत्ता के प्रभुत्व स्थापित करने का मामला है।

न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि आधार अधिनियम की धारा 57 संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का अतिक्रमण करती है। यह भी स्पष्ट किया कि अनौपचारिक निजता और डाटा को सार्वजनिक करने का अधिनियम लाना नागरिकों पर एक सरकारी निगरानी तंत्र बैठाने जैसा ही है। न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने सरकार की मंशा पर भी सवाल किया और कहा कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय के कई अंतरिम आदेशों का अपने राजनीतिक एजेंडे के तहत उल्लंघन किया है और देश के करोड़ों लोगों का डाटा और सूचना गलत तरीके से तीसरे पक्ष को हस्तांतरित हो जाने दिया है। उन्होंने कहा है कि आधार डाटा  सुरक्षित नहीं है और यह देश के नागरिकों की निजता और स्वतंत्रता के साथ देश की व्यवस्था के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है। इस तरह से आधार पर फैसला भले ही आ गया हो, लेकिन इस पर बहस अभी भी बाकी है।

न्यायाधीश चंद्रचूड़ के फैसले से संकेत मिलता है कि आधार पर कानूनी लड़ाई शायद आगे भी जारी रहेगी। उच्चतम न्यायालय के मौजूदा फैसले से इतना तो साफ हो गया है कि सरकार देश के व्यापक हित से जुड़े मसलों में कुछ प्रक्रियाओं के तहत सूचना ले सकती है, लेकिन नागरिकों के साथ निगरानी एजेंसी जैसा बर्ताव नहीं कर सकती है। इस फैसले के बाद सरकार को आधार अधिनियम में कई संशोधन करने पड़ेंगे। धन विधेयक के मसले पर सवालों का सामना करना पड़ेगा और चंद्रचूड़ के अल्पमत फैसले में उठाए गए संवैधानिक पहलुओं पर भी जवाब देना होगा। हो सकता है कि यह मामला एक बार फिर से उच्चतम न्यायालय में जाए और इसकी संवैधानिकता की समीक्षा कोई और बड़ी संवैधानिक पीठ करे। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है कि बहस और तर्क की गुंजाइश हमेशा बनी रहे और एक बेहतर व्यवस्था की दिशा में समाज आगे बढ़ता रहे।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आधार पर बड़ा फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि कहां यह जरूरी होगा और कहां नहीं। फैसला देने वाले पांच न्यायाधीशों की पीठ में शामिल एक न्यायाधीश डीवाइ चंद्रचूड़ ने इसके कई पहलुओं के प्रति अपनी असहमति व्यक्त की है। आधार डाटा की सुरक्षा और उसके दुरुपयोग पर गाहेबगाहे उठते सवालों को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में इससे नए तरह के बहस की शुरुआत हो सकती है।