
गौरतलब है कि नब्बे के दशक के 1991 और 1996 के आम चुनाव में राम मंदिर विवाद केंद्रीय मुद्दा था। इसके बाद हुए 1998, 1999, 2002, 2009 और 2014 के आम चुनाव में यह विवाद धीरे-धीरे परिदृश्य से गायब होता चला गया। यहां तक कि वाजपेयी सरकार द्वारा जनवरी 2002 में दोनों पक्षों की बातचीत के लिए अयोध्या विभाग के गठन, मार्च 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को खुदाई के आदेश, जुलाई 2009 में बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विध्वंस की जांच के लिए गठित लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट आने और 30 सितंबर 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी यह विवाद आम चुनाव में मुख्य मुद्दा नहीं बन पाया।
अब जबकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस विवाद के निपटारे केलिए सुनवाई का रास्ता तेज हुआ है, तब इसके केंद्रीय मुद्दा बनने के आसार बढ़ गए हैं। चूंकि इस मामले में जल्द फैसला आने के आसार हैं, ऐसे में लोगों की दिलचस्पी इस मुद्दे पर बढ़ेगी। बहरहाल भाजपा सुनवाई का रास्ता साफ हो जाने से खुश है।