
रायपुर जगदलपुर मार्ग पर फरसगांव के पास साल में एक बार लगने वाला लिंगेश्वरी मेला इस साल 19 सितंबर को लगेगा। यहां छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओड़िशा, तेलंगना और महाराष्ट्र से भी श्रद्घालु आते हैं। दरअसल यह मान्यता है कि जिन दंपतियों को लंबे समय से संतान सुख नहीं मिल पाया है वे यहां आकर पूजा करते हैं, जिससे उनकी मनोकमना पूरी होती है।
इस मंदिर की ख्याति हर साल इस तरह बढ़ रही है कि पूजा पाठ के लिए अब सुबह पांच बजे से श्रद्घालु यहां जुटते हैं और रात 10 बजे के बाद भी अपनी बारी का इंतजार करते नजर आते हैं।
यह मंदिर प्रतिवर्ष भादो माह की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के बाद आने वाले बुधवार को खोला जाता है। इस मंदिर में अधिकांश श्रद्धालु संतान की कामना को लेकर पहुंचते हैं। यह प्राकृतिक रूप से पत्थरों के बीच बना खोहनुमा कमरा है जिसमें शिवलिंग की तरह लिंगाई माता की मूर्ति है।
मंदिर का प्रवेश द्वार इतना छोटा है कि यहां बैठकर या लेटकर ही प्रवेश किया जा सकता है और मंदिर के अंदर शिवलिंग के चारों ओर 10 से 12 लोग बैठकर पूजा कर सकते हैं। इस मंदिर में प्रसाद के रूप में सिर्फ खीरा, ककड़ी चढ़ाकर लिंगई माता को भेंट किया जाता है। जिसके बाद पुजारी प्रसाद के रूप में चढ़े हुए खीरे और ककड़ी को भक्तों को देता है। इस प्रसाद को मंदिर परिसर में ही बैठकर खाया जाता है। कहा जाता है कि यह परंपरा हजारों वषोर् चल रही है। बाकी साल के 363 दिन इस मंदिर के पट बंद रहते है।
विशाल भंडारे की रहती है व्यवस्था
जिस दिन मेला लगता है उस दिन स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा बाहर से आए हुए लोगों के लिए पूरी व्यवस्था की जाती है। विशाल भंडारे का आयोजन भी स्थानीय जनप्रतिनिधियों व ग्रामवासियों द्वारा समिति बनाकर की जाती है। पुलिस प्रशासन भी सुरक्षा के हिसाब से शिविर लगाती है। मंदिर समिति के ईश्वर कोर्राम, धनराज कुलदीप, लोकेश गायकवाड़ सहित सैकड़ों समाज सेवी, जनप्रतिनिधि आदि तैयारियों में जुट गए हैं।
दस हजार से ज्यादा लोगों की जुटती है भीड़
रायपुर से जगदलपुर मुख्य मार्ग पर दिन-रात यात्री वाहन चलते हैं। नेशनल हाइवे में फरसगांव तक बसें और उसके बाद मंदिर तक छह किमी सफर के लिये टैक्सियां का सहारा लेना पड़ता है। अन्य प्रदेशों से आने वाले श्रद्घालु निजी वाहन से तो कई दंपती मोटर साइकिल से भी मेला स्थल तक चले जाते हैं। यहां एक ही दिन लगभग 10 हजार से भी ज्यादा लोगों की भीड़ जुटती है।