अज़ादारी की शान में ख़लल बन गये हैं नकली नवाब

लखनऊ ht के नवाबीन जिन्होंने अज़ादारी को दुनिया में एक ख़ास पहचान दिलाई उनकी रूह आज शर्मिंदा होती होगी। लखनऊ की अज़ादारी को कला-संस्कृति और तमाम मज़हबो मिल्लत से जोड़ने वाले नवाबीन का मक़सद बहुत वसी था। इमाम हुसैन कौन थे? उनका मक़सद क्या था? कर्बला की जंग क्यों हुई? हुसैन ने अपनी और अपने साथियों की जाने क्यों कुर्बान कीं?अज़ादारी की शान में ख़लल बन गये हैं नकली नवाब

ये सिर्फ एक मजहब की लड़ाई नहीं थी। हुसैन पूरे आलम-ए-इंसानी में खत्म होती इन्सानियत को बचाना चाहते थे। इसलिए नवाबों ने अज़ादारी को आकर्षित बनाने के लिए उसे कला-शिल्प और साहित्य को जोड़कर अज़ादारी को एक रुहानी संस्कृति में ढाल दिया। ताकि सिर्फ शिया नहीं हर मज़हब और हर समुदाय के लोग अज़ादारी से जुड़ें। ताज़िये से लेकर बैंड बाजे, तमाम तरह के तबर्रुक, काव्य धारा जुड़ी तो तमाम मज़हबो और फ़िरक़ों के लोग अज़ादारी में सम्मिलित हुए।

आकर्षण के साथ लोगों को रोजगार से जोड़ना भी अज़ादारी का मक़सद था। तबर्रुक, लंगर और तोरा (तरह तरह के शाही खाने) तक़सीम किये जाते थे, ताकि साल भर जिन्हें शाही खाने नसीब नही होते हैं वो हुसैन के नाम पर अच्छा खाना खा सकें। हिन्दु, मुसलमान, सुन्नी शिया और तमाम मजहबों-फिरकों, मसलको व समुदाय के गरीब लोग मोहर्रम में हुसैन के नाम पर शाही तबर्रुक से अपना पेट भरते रहे हैं।

लेकिन ये क्या सिर्फ शेरवानी और चूड़ीदार पाजामा पहन कर इन नवाबीन के वंशज होने का दावा करने वाले आज के नवाबों का किरदार तो उन हुसैनी नवाबीन के बिल्कुल विपरीत है। ये हुसैनाबाद ट्रस्ट द्वारा बांटे जाने वाले तबर्रुक की हड्डी-बोटी के लिए आपस में लड़ रहे हैं। जिन नवाबीन ने दुनिया को तहज़ीब का सलीक़ा सिखाया क्या उनके वंशज इतने बदतहज़ीब हो सकते हैं! तबर्रुक बांटने का मक़सद ग़रीबों का पेट भरना है लेकिन ये तो ग़रीबों का हक़ लड़ झगड़ कर अपने घर उठा ले जाते हैं।

मोहर्रम की अज़ादारी को प्रभावित करने के लिए मोहर्रम के दौरान प्रशासन को यहां फिल्म की शूटिंग करने की इजाज़त के लिए अपनी रज़ामंदी देते हैं।
मुखबिरी करते हैं। सरकार और प्रशासन के पिट्ठू बन कर अज़ादारी का दायरा तंग किये जाने पर कभी कोई आवाज़ नहीं उठाते।
अब क़ौम को आगे आकर इन नक़ली नवाबों की नक़ाब उतारने की ज़रूरत है। इनका शजरा खोलने की ज़रूरत है। इनकी मुखबिरी पर लगाम लगाने की ज़रूरत है। अज़ादारी के सरबराह बन कर शासन-प्रशासन पर दबाव बनाकर अपने ज़ाती काम करवाने वाले ये सरकारी एजेंट नवाबों के वंशज हो ही नही सकते।

जो नवाब रोटी और बोटी के लिए पुरज़ोर तरीके से अपनी आवाज़ उठा रहे है, वो ऐसी एक जुटता अज़ादारी के मामले में भी दिखाते तो कम से कम हुसैनाबाद में सबील,बैनर और काले झंडे लगाने से रोकने की हिम्मत प्रशासन कभी नही करता, नवाबीने अवध ने इस इलाके को बसाया ही हुसैन की अज़ादारी के लिए था येही वजह है कि इस इलाके का नाम ”हुसैन आबाद” रखा गया था, जहां अज़ादार हुसैन की अज़ादारी बिना रोक टोक कर सकें, हुसैनाबाद ट्रस्ट अपने आपमे पहला ट्रस्ट है जिसका निगराँ अज़ादारी को नुक़सान पहुचाने व मजलिस ओ मातम के प्रोग्रामों में रोड़ा अटकाने की हर मुम्किन कोशिश करता रहता है, क्योंके पूर्व में अज़ादारी के मामलों में प्रशासन द्वारा जो कुछ ग़लत फैसले किये गए उसमे किसी नवाब ने कभी कोई विरोध नही किया, यही कारण है कि जिन नवाबों ने हुसैनाबाद को अज़ादारी के लिए बसाया था वहां आज मोहर्रम में शिया काले झंडे और बैनर नही लगा सकते, प्रशासन के इस तालीबानी फैसले के विरोध में नवाबों ने एकजुटता क्यों नही दिखाई, अज़ादारी का मामला था पुरज़ोर आवाज़ उठाते,बात न बनती तो मुज़ाहिरा करते फिर भी अगर बात ना बनती तो नवाबीन कोर्ट भी जा सकते थे लेकिन ऐसा कभी नही हुआ, हुसैन के नाम पर अपनी दौलत लुटाने वाले नवाबीने अवध के आज के वंशज अपनी व्यक्तिगत पहचान बनाने व राजनीतिक पार्टियों के स्टेज की शोभा बढ़ाने में व्यस्त हैं,

लेकिन आज जब बात रोटी और बोटी की आई तो नवाबीन तड़प उठे अब उन्हें एहसास हो रहा है कि ट्रस्ट ने पौने दो सौ साल पुरानी परम्परा को तोड़ा है और सच्चे नवाबीन पर उंगली उठाई है,उनका कहना है कि तबर्रुक उनके बुज़ुर्गों की सौग़ात है,तबर्रुक मिलना बन्द हुआ तो बुज़ुर्गों की सौग़ात कह कर बेचैन होने लगे, अगर इन नवाबीन को ये याद रहता कि अज़ादारी किसकी सौग़ात है, और वो अज़ादारी के मामले में प्रशासन व ट्रस्ट की गलत नीतियों का जम कर विरोध करते तो ट्रस्ट आज तबर्रुक के मामले में नवाबियत पर उंगली ना उठाता,जिस अज़ादारी को फ़रोग़ देने के लिए नवाबीन ए अवध अपनी दौलत लुटाते रहे, अफसोस उन्ही के वंशज आज ट्रस्ट द्वारा बाटे जाने वाले तबर्रुक (रोटी और बोटी) के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। जारी 

शबीहुल हसन