करबला हमे ज़ुल्म से नफरत और मज़लूम से मोहब्बत करने का पैग़ाम देती है: ज़ाकिर

अंजुमन हैदरिया क़ुरापट्टी ने की नौहा ख्वानीअंजुमन हैदरिया क़ुरापट्टी ने की नौहा ख्वानी  जौनपुर । "तशनगी कैसे सकीना की बुझाये ज़ैनब, ख़ाक पे कैसे यतीमा को सुलाए ज़ैनब" नौहा जैसे ही अंजुमन हैदरिया कुरापट्टी ने पढ़ा अज़ादार बेचैन हो गए चारो तरफ से रोने बिलखने की दर्दनाक आवाज़ गूँजने लगी । तीसरी मोहर्रम शुक्रवार को शहर के क़ुरापट्टी खानपट्टी के इमामबारगाहो में या हुसैन की सदाएं गूंज रही थीं। अंजुमन हैदरिया के साहबे बयाज़ एहतिशाम अब्बास , दिलशाद अली ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की 4 साल की बच्ची जनाबे सकीना का दर्दनाक नौहा पढ़ा जिससे पूरा वातावरण ग़म में डूब गया । इसके साथ ही हजरत इमाम हसैन (अ.स) की याद मे इमामबारगाह खानपट्टी में मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना ज़ैनुलआब्दीन ने ने हज़रत इमाम हुसैन की शहादत पर प्रकाश डाला । उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन ने अपनी व अपने संबंधियों की शहादत देकर इस्लाम धर्म की हिफाज़त की। इमाम हुसैन की शहादत को याद करके इस माहे मुहर्रम में इंसानियत पसन्द लोग शोक मनाते हैं एवं नौहा व मातम करते है । ज़ाकिरे अहलेबैत दिलशाद अली ने कहा कि करबला हमे जुल्म से नफरत और मजलूम से मोहब्बत करने का पैगाम देती है। नफरत का जज्बा इंसान को ज़ालिम बना देता है, जबकि मोहब्बत इंसान को फरिश्ते से भी बुलंद मुकाम अता करती है। उन्होंने कहा कि करबला में इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की कुर्बानी आज भी हर इंसान के लिए नमूना ए अमल है। मोहर्रम का महीना इन्हीं शहीदों की याद है जिसमे लोग इमाम हुसैन व उनके साथियों की कुर्बानी याद करके गिरिया ओ ज़ारी करते हुए नौहाख्वानी व सीनाजनी करते हैं । उनकी याद में काला लिबास पहनते हैं । यह सिलसिला दसवीं मोहर्रम तक जारी रहता है । इस मौके पर सैय्यद अली , गुलामुस्सकलैन, नौशाद अली, मोहम्मद हसन, ज़ीशान हैदर , शाहिद अल्वी , आरिफ़ हुसैनी, कासिद अली सहित बड़ी संख्या में अज़ादार मौजूद रहे।

जौनपुर तशनगी कैसे सकीना की बुझाये ज़ैनब, ख़ाक पे कैसे यतीमा को सुलाए ज़ैनब” नौहा जैसे ही अंजुमन हैदरिया कुरापट्टी ने पढ़ा अज़ादार बेचैन हो गए चारो तरफ से रोने बिलखने की दर्दनाक आवाज़ गूँजने लगी । तीसरी मोहर्रम शुक्रवार को शहर के क़ुरापट्टी खानपट्टी के इमामबारगाहो में या हुसैन की सदाएं गूंज रही थीं। अंजुमन हैदरिया के साहबे बयाज़ एहतिशाम अब्बास , दिलशाद अली ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की 4 साल की बच्ची जनाबे सकीना का दर्दनाक नौहा पढ़ा जिससे पूरा वातावरण ग़म में डूब गया । इसके साथ ही हजरत इमाम हसैन (अ.स) की याद मे इमामबारगाह खानपट्टी में मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना ज़ैनुलआब्दीन ने ने हज़रत इमाम हुसैन की शहादत पर प्रकाश डाला । उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन ने अपनी व अपने संबंधियों की शहादत देकर इस्लाम धर्म की हिफाज़त की। इमाम हुसैन की शहादत को याद करके इस माहे मुहर्रम में इंसानियत पसन्द लोग शोक मनाते हैं एवं नौहा व मातम करते है ।
ज़ाकिरे अहलेबैत दिलशाद अली ने कहा कि करबला हमे जुल्म से नफरत और मजलूम से मोहब्बत करने का पैगाम देती है। नफरत का जज्बा इंसान को ज़ालिम बना देता है, जबकि मोहब्बत इंसान को फरिश्ते से भी बुलंद मुकाम अता करती है। उन्होंने कहा कि करबला में इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की कुर्बानी आज भी हर इंसान के लिए नमूना ए अमल है। मोहर्रम का महीना इन्हीं शहीदों की याद है जिसमे लोग इमाम हुसैन व उनके साथियों की कुर्बानी याद करके गिरिया ओ ज़ारी करते हुए नौहाख्वानी व सीनाजनी करते हैं । उनकी याद में काला लिबास पहनते हैं । यह सिलसिला दसवीं मोहर्रम तक जारी रहता है । इस मौके पर सैय्यद अली , गुलामुस्सकलैन, नौशाद अली, मोहम्मद हसन, ज़ीशान हैदर , शाहिद अल्वी , आरिफ़ हुसैनी, कासिद अली सहित बड़ी संख्या में अज़ादार मौजूद रहे।