
ये 65 साल पुराने लखनऊ में अज़ादारी के एक जुलूस की तस्वीर है। इतने अरसे में ना जाने कितनी संस्कृतियां बनी और मिटीं, लेकिन लखनऊ की अज़ादारी एक ऐसी रूहानी संस्कृति है जो दिन दूना रात चौगुनी बढ़ती गई। इंसानियत की मुहाफिज़ और आतंकवाद के खिलाफ आंदोलन की सूरत में लखनऊ की ऐतिहासिक अज़ादारी को गंगा जमुनी तहजीब के रखवाले इस शहर के बादशाहों और नवाबों नें कला और संस्कृति प्रधान बनाया।
इस रूहानी सांस्कृतिक अनुष्ठान से तमाम मजहबो मिल्लत को जोड़ा। और फिर आजाद हिन्दुस्तान की हुकूमतों ने इसे कायम रखने में पूरा योगदान दिया। लखनऊ की अज़ादारी में ऐतिहासिक पहली की जरीह और सातवीं मोहर्रम की मेंहदी के शाही जुलूस के अलावा तमाम मजलिसों का आयोजन सरकार/जिला प्रशासन की निगरानी में होता है। ये भारतीय धर्मनिरपेक्षता की जिन्दा मिसाल है।
गौरतलब है कि दुनिया की ज्यादातर इस्लामी हुकूमतें अपने मुल्क में अज़ादारी के आयोजनों में सहयोग देना तो दूर अज़ादारी मनाने की आजादी तक नहीं देती।
शायद इसीलिए भारतीय मुसलमान अपने मुल्क भारत से इस कद्र मोहब्बत करते हैं कि यदि उन्हें नौकरी करने विदेश जाना पड़ता है तो वो अपने साथ हिन्दुस्तान की मिट्टी ले जाते है।
-नवेद शिकोह