आजादी के 71 वर्ष बाद भी 16 रुपये है दुकान का किराया

आपको चौंकाऊ लग सकता है, पर है सोलहो आने सच। आजादी के 71 वर्ष बाद भी पूर्वी सिंहभूम के जिला मुख्यालय जमशेदपुर के साकची स्थित चटवाल रेडिमेंट स्टोर की दुकान का किराया टाटा स्टील महज 16 रुपये ही लेती है। यह दुकान टाटा स्टील ने स्वर्गीय साहेब सिंह को अलॉट किया था। साहेब सिंह का निधन 1988 में हो गया। इसके बाद पुत्र इंदर सिंह ने दुकान संभाली। लेकिन उनका भी निधन 1997 में हो गया। जिसके बाद उनके पुत्र हरविंदर सिंह मंटू ने दुकान की बागडोर संभाल ली। अब उनका बेटा संदीप सिंह दुकान संभाल रहा है।आपको चौंकाऊ लग सकता है, पर है सोलहो आने सच। आजादी के 71 वर्ष बाद भी पूर्वी सिंहभूम के जिला मुख्यालय जमशेदपुर के साकची स्थित चटवाल रेडिमेंट स्टोर की दुकान का किराया टाटा स्टील महज 16 रुपये ही लेती है। यह दुकान टाटा स्टील ने स्वर्गीय साहेब सिंह को अलॉट किया था। साहेब सिंह का निधन 1988 में हो गया। इसके बाद पुत्र इंदर सिंह ने दुकान संभाली। लेकिन उनका भी निधन 1997 में हो गया। जिसके बाद उनके पुत्र हरविंदर सिंह मंटू ने दुकान की बागडोर संभाल ली। अब उनका बेटा संदीप सिंह दुकान संभाल रहा है।  संदीप सिंह ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है लेकिन नौकरी नहीं कर वे पुस्तैनी दुकान संभाल रहे हैं। उनका कहना है कि पुरखों की विरासत को सहेजना हमारी जिम्मेदारी है। ऐसे पहुंचे थे लौहनगरी 1947 में पाकिस्तान से साहेब सिंह अपने परिवार को लेकर लौहनगरी पहुंचे थे। यहां उनके रहने खाने का भी ठिकाना नहीं था। तब वे लोग महुलबेड़ा में रहा करते थे और साकची बाजार के जंगलों को साफ कर वहां फुटपाथ में कपड़े की दुकान लगाया करते थे।  ADVERTISING  inRead invented by Teads  प्रकृति को पूजने का पर्व है करम पर्व यह भी पढ़ें 1954 में उसी जगह पर टाटा स्टील ने स्वर्गीय साहेब सिंह को कपड़े की दुकान अलॉट कर दी। जिसका नाम चटवाल रेडीमेंट स्टोर दिया गया। उस वक्त टीना शेड की दुकान हुआ करती थी। दुकान में साहेब सिंह अपने बेटे इंदर सिंह के साथ बैठा करते थे। उस वक्त दुकान का किराया 16 रुपये टाटा स्टील द्वारा लिया जाता था जो अब भी 16 रुपये ही है। लेकिन अंतर यह हो गया है कि अब दुकान को स्वर्गीय साहेब सिंह की चौथी पुस्त संभाल रही है। संदीप बताते हैं कि टाटा घराने के बसाए इस शहर की यही खासियत है।

संदीप सिंह ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है लेकिन नौकरी नहीं कर वे पुस्तैनी दुकान संभाल रहे हैं। उनका कहना है कि पुरखों की विरासत को सहेजना हमारी जिम्मेदारी है। ऐसे पहुंचे थे लौहनगरी 1947 में पाकिस्तान से साहेब सिंह अपने परिवार को लेकर लौहनगरी पहुंचे थे। यहां उनके रहने खाने का भी ठिकाना नहीं था। तब वे लोग महुलबेड़ा में रहा करते थे और साकची बाजार के जंगलों को साफ कर वहां फुटपाथ में कपड़े की दुकान लगाया करते थे।

1954 में उसी जगह पर टाटा स्टील ने स्वर्गीय साहेब सिंह को कपड़े की दुकान अलॉट कर दी। जिसका नाम चटवाल रेडीमेंट स्टोर दिया गया। उस वक्त टीना शेड की दुकान हुआ करती थी। दुकान में साहेब सिंह अपने बेटे इंदर सिंह के साथ बैठा करते थे। उस वक्त दुकान का किराया 16 रुपये टाटा स्टील द्वारा लिया जाता था जो अब भी 16 रुपये ही है। लेकिन अंतर यह हो गया है कि अब दुकान को स्वर्गीय साहेब सिंह की चौथी पुस्त संभाल रही है। संदीप बताते हैं कि टाटा घराने के बसाए इस शहर की यही खासियत है।