यज़ीदी बादशाहत में हुई थी पहली मॉब लिंचिंग

अमानवीय माॅब लिचिंग के खिलाफ आंदोलन का नाम है अज़ादारी। दुर्भाग्य ये कि मोहर्रम के चंद दिनों पहले दो नामदार शिया गुटों की गैंगवार मोहर्रम में अज़ादारी की तहजीब को बना सकती हैं माॅब लिचिंग का शिकार।

माॅब लिचिंग का शाब्दिक अर्थ है-एक अकेले पर भीड़ की ताकत द्वारा हमला करना। चौदह सौ साल पहले कर्बला के मैदान में ऐसा ही हुआ था। उस दौर में कुछ मुल्लों ने हुकूमत के स्वार्थ में गंदी सियासत करके इंसानियत का खून बहाना शुरू कर दिया था। इंसानियत, अमन और सौहार्द पसंद इमाम हुसैन भारत आना चाहते थे। इमाम अंतर्यामी होते थे। वो जानते थे कि भारत की धरती पर धर्म की नफरत की नहीं इंसानियत और भाईचारे की फसल उगती है। ये अमन, भाईचारे और इंसानियत पसंद लोगों का देश है। परिस्थितियों वश हुसैन भारत नहीं आ सके। और हुकूमत के लालची कट्टर मुल्लों ने हुसैन और उनके साथियों को कर्बला में शहीद कर दिया। हुसैनी काफिले के अकेले एक-एक शख्स पर हजारों यज़ीदियों ने हमले करके उन्हें शहीद कर दिया था।

दुनिया में पहले आतंकवादी शासक यज़ीद के खिलाफ पहली आवाज बुलंद करने वाले इमाम हुसैन की शहादत की याद में इस्लामी कैलंडर के पहले माह मोहर्रम में अज़ादारी होती है। आतंकवाद के खिलाफ आंदोलन करने वाली अज़ादारी की बहुत सारी खूबियां हैं। इसका इतिहास और परम्पराएं अद्भुत हैं।

लखनऊ को अदब और तहजीब की नेमतें किसने दीं! अज़ादारी ने।

आतंकवाद, अमानवीय आचरण और नफरत के खिलाफ आंदोलन का नाम है अज़ादारी ।
अज़ादारी की फर्श-ए-अज़ा तमीज-तहज़ीब, अदब, धैर्य, त्याग, मिलनसारी, इत्तेहाद, रिश्तों को निभाने का फर्ज़ और मुल्क से मोहब्बत का सबक सिखाती है।

नवाब आसिफुद्दौला और तमाम नवाबों-बादशाहों ने गंगा जमुनी तहजीब और तमद्दुल को अज़ादारी के प्लेटफार्म पर ही परवान चढ़ाया था। कालजयी शायर मिर्जा दबीर-मीर अनीस.. ने मर्सिये के जरिए उर्दू अदब को एक नया रंग दिया। और फिर मरसियानिगारी के साथ अज़ादारी में उर्दू अदब ने जगह बनाई। कृष्ण बिहारी नूर जैसे दर्जनों हिन्दू कवियों ने इमाम हुसैन के प्रति अपने अकीदे के ज़रिए हिन्दी साहित्य को सौहार्द की खुश्बू से महकाया।

तमाम मजहबो मिल्लत का अज़ादारी और हुसैनियत से जुड़ा ये अकीदा लखनऊ की अज़ादारी को दुनिया के नक्शे पर विशिष्ट स्थान दिला सका। लाखों आम लखनवी शिया अज़ादारों की पीढ़ियों और बुज़ुर्गों का भी बड़ा ताआऊन (योगदान) भुलाया नहीं जा सकता। जिन्होंने कठोर अनुशासन और तमीज-तहज़ीब के सौंदर्य से आकर्षित बनी अज़ादारी को तहजीब का गहवारा साबित कर दिया।

जिंदगी को हर खुश रंग से दूर ले जाना.. काला लिबास.. जलती जमीन पर नंगे पैर चलना.. संजीदगी.. पाकीज़गी.. तहजीब.. अदब और त्याग की पाठशाला वाली अज़ादारी ने सब्र का पाठ ख़ासतौर से पढ़ाया है। क्योंकि हुसैन ने सब्र की बेजोड़ मिसाल पेश की थी। शायद इसलिए ही शायरों ने सब्र की इंतिहा का दूसरा नाम हुसैन रख दिया।

अज़ादारी के अद्भुत आदाब (नियमों) का पालन आज भी अज़ादार बखूबी करते है।
लेकिन अफसोस कि चंद रसूखदार, ओहदेदार, खानदानी, नामदार और दौलतमंद लोग अज़ादारी के साथ दग़ाबाजी करने पर आमादा हैं। चंद दिनो बाद शुरू होने जा रहे मोहर्रम की अज़ादारी के दौरान आपसी टकराव का माहौल पैदा करने में ये रसूखदार लोग कोई कसर नही छोड़ रहे हैं।

निजी स्वार्थ की लड़ाई में एक दूसरे को धमकियां दे रहे हैं। सार्वजनिक प्लेटफार्म पर.. पब्लिक डोमेन पर एक दूसरे को गालियां दे रहे हैं। एक दूसरे के घरों की औरतों को खुलेआम पब्लिक के बीच इतनी गंदी गालियाँ दे रहे हैं कि घटिया से घटिया आदमी भी सुन कर कानों पर हाथ रख ले।

मैं एक बार फिर यही बात दोहरा रहा हूं। ये लोग लखनऊ के लाखों आम शियों में नहीं हैं। शिया कौम तो शरीफ हैं। तहजीब याफता हैं।असली हुसैनी हैं। असली अज़ादार हैं। अमन पसंद हैं। इंसानियत पसंद हैं। देशभक्त हैं। जो कानून व्यवस्था को बेहतर बने रहने में सहयोग करती है। जिनके ग़म और सोच में भी भाईचारे और सौहार्द की खुश्बू आती है।
मैं शियत को बदनाम करने वाले उन चंद गुटबाज शियों की बात कर रहा हूं जो सिर्फ नाम के शिया मुसलमान हैं। जिनके नाम उंगलियों पर लिये जा सकते हैं। जो रसूखदार हैं। जो दौलतमंद हैं। ताकतवर हैं। जो ओहदेदार और नामदार हैं। सरकारी ओहदे और रसूख हासिल करने में माहिर हैं । जो आम पब्लिक को भड़काते हैं। जो शरीफ लोगों की भीड़ का गलत इस्तेमाल करते हैं। जो धर्म को भुनाने हैं। जो सियासत को गंधाते हैं। जो सियासी पंहुच रखते हैं।

सोशल मीडिया पर इन ताकतवर लोगों के गैंगवार की नफरत की चिंगारियां साफ दिख रहीं है। हमे-आपको टकराव की आहट साफ सुनाई दे रही है। हमे-आपको अज़ादारी की तहजीब और सुरक्षा की भी फिक्र है।  मालुम नहीं ये सब खुफिया तंत्र को दिख रहा है कि नहीं! खुफिया तंत्र क्या तुम ये सब देख रहे हो। या सो रहे हो। या जागते हुए भी जानबूझकर तुमने आंखे बंद कर ली हैं !  चंद दिनों बाद मोहर्रम शुरू हो रहा है। एक दूसरे को धमकियों और गालियों के विडियो लगाता जारी हो रहे हैं। तुमने अब तक इसे काबू करने के लिए क्या किया!

-नवेद शिकोह
8090180256
(इस लेख का मुख्य उद्देश्य अमन और शांति के सहयोग हेतु जागरूकता फैलाना है।)