
रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर व उसके आसपास निवास करने वाली विलुप्त होती पहाड़ी मैना पर चल रहे शोध में कई हाई मिस्ट्री तथ्य सामने आए हैं। शोध के तहत अब इस राजकीय पक्षी की गतिविधियों पर निगहबानी के लिए कांगेर वैली नेशनल पार्क बस्तर में ट्रैपिंग कैमरे लगाए जाएंगे। कैमरे के माध्यम से पहाड़ी मैना की जानकारी एकत्रित की जाएगी।

राज्य में विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी पहाड़ी मैना पर किए जा रहे शोध में जो तथ्य प्रकाश में आए हैं, उसके अनुसार यह पक्षी कांगेर वैली नेशनल पार्क के कुछ हिस्सों में अभी मौजूद है। पक्षी के भोजन व आवास का प्रबंध न होने के कारण उसकी संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है।
शोध कर रही टीम के सदस्यों की मानें तो पहाड़ी मैना अपना घोंसला स्वयं नहीं बनाती है। वह दूसरे पक्षियों के घोसलों में अपना अंडा देती है, इसलिए उसका वंश विस्तार अपेक्षाकृत कम होता है। पहाड़ी मैना की सबसे बड़ी मिस्ट्री उसके नर व मादा को पहचानना है। विशेषज्ञों की मानें तो उसके पंखों से लैब परीक्षण के अलावा उसे पहचान पाना मुश्किल है।
पहाड़ी मैना पलास की पत्तियों का रस ज्यादातर आहार में लेती है, इसलिए उसे पालना भी आसान नहीं है। पहाड़ी मैना बहुत ही संवेदनशील है और वह अपने निर्धारित माहौल के आसपास ही रहती है। वह इधर-उधर नहीं जाती। खासकर उन इलाकों में तो वह जाती ही नहीं, जहां शोरगुल हो।
शोध के अगले क्रम में अब कांगेर वैली नेशनल पार्क में ट्रैपिंग कैमरे लगाकर उसकी गतिविधियों की निगहबानी की जाएगी, उनके बाबत ज्यादा जानकारी इकट्ठी की जाएगी। शोध टीम के मानस मनोहर उज्जैनी की मानें तो यदि पहाड़ी मैना के आवास व भोजन का प्रबंध किया जाए तो उसे संरक्षित करने में आसानी होगी।
इन पेड़ों पर रहता है बसेरा
पहाड़ी मैना पीपल, बरगद, जड़ी, पलास, जामुन आदि पेड़ों पर अपना बसेरा बनाती है, इसलिए वन क्षेत्रों में इन पेड़ों को संरक्षित करने की आवश्यकता है। यदि इन पेड़ों की उपलब्धता रहेगी तो पहाड़ी मैना विलुप्त होने से बच जाएगी।
दूसरे पक्षियों की आवाज भी निकालती है पहाड़ी मैना
पहाड़ी मैना पक्षी की एक खासियत यह भी है कि वह दूसरे पक्षियों की आवाज की मिमिक्री कर लेती है। शोध करने वालों ने बताया कि शोध के दौरान ऐसे कई तथ्य सामने आए कि वह दूसरे पक्षियों की आवाज निकाल रही थी। जब विशेषज्ञ आवाज बदल कर बोले तो पता चला कि वह तो पहाड़ी मैना ही है।
शोध में नक्सल भी रोड़ा
शोध कर रही टीम के सदस्यों का कहना है कि पहाड़ी मैना के शोध की राह में नक्सली भी बाधा हैं। नेशनल पार्क के उन इलाकों में, जहां पहाड़ी मैना की संभावना है, वहां नक्सली समस्या है, इस कारण शोध नहीं हो पाता।