
लुधियाना। पंजाब विधानसभा में फिर करतारपुर गलियारे को श्रद्धालुओं के लिए खोलने का प्रस्ताव पारित कर दिया गया। यह पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी पंजाब विधानसभा में प्रस्ताव पास हुआ था लेकिन अगर राज्य सरकार ने केंद्र के साथ फालोअप किया होता तो बात बनती। यही नहीं, केंद्र सरकार ने भी पाकिस्तान के न्यौते पर अगर बातचीत का क्रम बढ़ाया होता तो दस साल पहले ही शायद कारिडोर खुल गया होता। सरकारों की ढील की वजह से ही आज तक सिख श्रद्धालु करतारपुर साहिब जाकर अपने पहले गुरु गुरुनानक देव जी की बहुमूल्य यादगारी के दर्शन नहीं कर पाए।
बादल सरकार ने भी किया था प्रस्ताव पास लेकिन फालोअप नहीं किया
लुधियाना के सुखदेव सिंह वालिया ने इस संबंध में पहले पंजाब सरकार से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो बताया गया कि पंजाब विधानसभा में 2010 में इस बाबत प्रस्ताव पास हुआ था। उसे केंद्र को भेजा गया लेकिन कोई फालोअप नहीं हुआ। केंद्र की तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने भी कोई खास रुचि उसमें नहीं दिखाई।
2008 में पाक ने गलियारा खोलने पर बातचीत के लिए दिया था न्यौता
इसके बाद, केंद्र सरकार से इस संबंध में आरटीआइ के तहत जानकारी मांगी कई तो विदेश मंत्रालय के रिकार्ड में यही जिक्र पाया गया कि भारत सरकार ने वर्ष 2005 में करतारपुर साहिब को श्राइन की सूची में शामिल करने के लिए पाकिस्तान सरकार को प्रस्ताव दिया, ताकि ‘धार्मिक सराय की यात्रा-1974 के द्विपक्षीय प्रोटोकाल’ के तहत सिख श्रद्धालुओं को श्री करतारपुर साहिब जाने की अनुमति मिल सके।
27 जून, 2008 को भारत के विदेश मामलों के मंत्री और पाकिस्तान के विदेश मंत्री के बीच बैठक हुई, जिसमें पाकिस्तान ने प्रस्ताव रखा कि भारत की एक छोटी टीम करतारपुर साहिब में बिना वीजा जाने के लिए तौर-तरीकों पर बातचीत के लिए उनके देश में आ सकती है। लेकिन उसके बाद से पाकिस्तान की ओर से अभी तक कोई जवाब नहीं आया है। यानी कि 2008 में यदि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया गया होता तो करतारपुर गलियारा खुल चुका होता। पंजाब सरकार ने जो प्रस्ताव पास करके भेजा था, उसका कहीं कोई जिक्र नहीं है।
…काश बनाया होता दबाव
लुधियाना में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कबड्डी कप के दौरान पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के भाई शहवाज शरीफ बतौर मेहमान आए थे। उन्होंने भावुक होकर आकर कहा था, ‘आज आखां वारिस शाह नूं, कित्थो कब्रां विच्चो बोल। ते अज किताब-ए-इश्क दा, कोई अगला वरका खोल।’ सुखदेव वालिया कहते हैैं कि उस समय मंच पर मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल थे। यदि उस वक्त बादल साहिब ने शरीफ पर दबाव बनाया होता तो यह गलियारा उसी वक्त खुल जाना था।
सिखों का पहला गुरुद्वारा है श्री करतारपुर साहिब, यहीं से हुई थी लंगर प्रथा की शुरुआत
भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास पाकिस्तान के जिला नारोवाल स्थित गुरुद्वारा साहिब सिख जगत का पहला गुरुद्वारा है। करतारपुर शहर की नींव भी उस समय श्री गुरुनानक देव जी ने रखी थीं। उनका जन्म भले ही ननकाना साहिब में हुआ, लेकिन उन्होंने अपने जीवन के अंतिम 18 साल इसी स्थान पर बिताए और यहीं ज्योति जोत समाए थे। इतना ही नहीं, गुरुनानक देव जी ने लंगर परंपरा की शुरूआत भी यही पर की थी।