
सोशल मीडिया का समुद्र मंथन करके देखिये विष ही नही अमृत भी हासिल होता है। सीप के घिनौने और बदसूरत मांस को नजरअंदाज करके इसके अंदर छिपे बेशकीमती खूबसूरत मोती को तलाशये।
मोदी का अंध विरोध-मोदी की अंध भक्ति, हिन्दू-मुसलमान, सवर्ण-पिछड़े/दलित, शिया-सुन्नी… के बीच नफरतों का उबाल, पप्पू-फेकू पर चुटकुले, गाली ग्लौज, क्रोध, कुतर्क … ….. ऐसी बकवास का कूड़ादान बन गया है सोशल मीडिया। और हम आप अपने जरूरी काम छोड़कर इस कूड़े में लोटा करते हैं।
कल एहसास हुआ कि इस काजल की कोठरी में अपना मुंह काला करने के बजाय हम इस काजल से अपनी आंखों को खूबसूरत और दूरदर्शी बना सकते हैं। सोशल मीडिया का काजल तमाम मुश्किलों को हल करने की दिशा भी दिखा देता है और इन मुश्किलों को मिनटों में हल भी कर देता है।
आलोचना खुद की करें तो आलोचना सार्थक होती है। अपनी आलोचना के साथ बात को स्पष्ट करते हैं-सोशल मीडिया पर मैंने ही पत्रकार संगठनों और पत्रकार नेताओं के खिलाफ इतना लिखा कि एक-दो किताबें छप जायें। लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ। क्योंकि आलोचना के साथ समाधान का कोई फार्मूला मेरे पास नहीं था। जब नजरिया नकारात्मक हो तो हमारे कलम की निगाहें सकारात्मक पहलू की तरफ देखती भी नहीं हैं। और लाख कलम घिसने के बाद भी नतीजा जीरो ही रहता है।
कल वरिष्ठ पत्रकार और अग्रज दिनेश पाठक जी ने आंखे खोल दीं। उनकी एक पोस्ट पढ़ी। जिसमें उन्होंने शहर के एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रतिष्ठित वरिष्ठ पत्रकार के बेटे के इलाज में मदद का आग्रह किया था। यहां उन्होंने पत्रकार संगठनों या सरकार को उनकी जिम्मेदारी का एहसास दिलाने जैसी कोई भी नकारात्मक बात नहीं लिखी।
असहाय पत्रकार की मजबूरी और बेबसी के साथ सरकार या पत्रकार संगठनों के गैरजिम्मेदाराना रवैये को बिलकुल नहीं जोड़ा। ना इनकी आलोचना की। बस पाठक जी ने अपनी पोस्ट शेयर करने या बहुत ही मामूली राशि के सहयोग की बूंद-बूंद से घड़ा भरने का आग्रह किया। घंटा भर में पोस्ट शेयर होने का सिलसिला तेज हो गया। कुछ घंटे में उनकी पोस्ट करीब अस्सी लोगो ने शेयर कर दी। मैंने भी पाठक जी की ये इल्तिजा अपनी वाल पर लगाई तो दर्जनों लोगों ने इसे शेयर कर दिया। पत्रकारों और पत्रकारिता की खबरों पर आधारित देश-दुनिया की चर्चित वेबसाइट भड़ास ने भी इस अपील को जगह दे दी। वाटसएप ग्रुप्स पर भी ये अपील वायरल होने लगी।
कुछ ही घंटों में मदद के लिए सज्जनों की कतार लग गयी। पत्रकार ही नहीं गैर पत्रकार भी सहयोग के हाथ बढ़ाने लगे।
जरुरतमंद के एकाउंट में सहयोग राशि पंहुचने लगी। कहा कुछ नहीं लेकिन शायद सरकार, पत्रकार संगठनों और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान को भी सोशल मीडिया की ये मुहिम कुछ एहसास जरूर करा गई होगी।