
सय्यद नासिर इमाम ज़ैदी उर्फ़ सिकन्दर नवाब साहब ने अपने अंशकालिक जीवन में स्वयं की कभी परवाह न करते हुए दूसरे लोगों की सेवा करना अपना ही अपना धर्म समझा ।
आपके पिता स्व . वज़ीर उल हसन ज़ैदी साहब ने जिस प्रकार मेहनत और लगन से अपने गाँव सय्यदापुर में हिन्दू एवं मुस्लिम लोगों के बीच में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का ताज़ीया रखा उनहीं दुआओं से वहां के लोग अपनी मन्नत और मुरादें पाने लगे । 
अपने पिता के दिए हुए संस्कार और मिली हुई विरासत का एक एक पत्ता उसी तरह संजो के रखना ठीक जैसे पिता जी किया करते थे वाक़ई बड़ा मुश्किल था ।
परिवार में भाई बहनों के बीच में आप सबसे छोटे थे किन्तु ज़िम्मेदारियों के एहसास ने सिकन्दर नवाब साहब को जल्द ही बूढ़ा बना दिया था ।
आज न सिर्फ़ परिवार वाले बल्कि अन्य लोग भी ख़ासकर गाँव वाले उनको याद करते करते रो पड़ते हैं और अक्सर उनके मुँह से सुना हैं यह कहतें हुए के हमरा बाप चला गवा !
नाम के अनुरूप ही आप मिज़ाज के भी सिकन्दर थे ! जो बात आप एक बार ठान लेते थे उसे तय समय पर ही पूरा करके दम लेतें थे ।
मजलिस में छौलस से आये हुए सय्यद सलमान हैदर साहब ने अपने साथियों के साथ सोज़ सलाम और मर्सिया पढ़ा ।
मजलिस में सय्यद हैदर अली , सय्यद अली इमाम ज़ैदी , सय्यद हसन इमाम ज़ैदी , सय्यद मोहसिन जाफ़री , सय्यद शहेंशाह हैदर आब्दी , सय्यद सुहेल जाफ़री , सय्यद अहसन रज़ा , सय्यद नज़ीर मुक़बिल , सय्यद असकरी हैदर , सय्यद मुहम्मद अब्बास, शाजी शैजब रिजवी, के लोग मौजूद रहे ।