
राजनीतिक इतिहास
सीतापुर:ht:-बीते दिनों सीतापुर से बहुजन समाज पार्टी की पूर्व सांसद कैसरजहां कांग्रेस में शामिल हो गई. पूर्व सांसद कैसरजहां को बीएसपी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने की वजह से निष्कासित कर दिया था.
सीतापुर लोकसभा क्षेत्र में किसी भी दल का डंका लगातार तीन बार से अधिक नहीं बजा है. सन 1980, 84 व 89 के चुनावों में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. वहीं आंकड़ों के मुताबिक बीएसपी ने वर्ष 1999, 2004 व 2009 में जीती थी. इसके अलावा कोई भी दल हैट्रिक नहीं लगा सका है. सीतापुर लोकसभा क्षेत्र का गठन पहली लोकसभा के साथ 1952 में हुआ था. 1952 के चुनाव भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के चचेरी भाई की पत्नी उमा नेहरू ने पहली बार चुनाव जीती थी. 1957 का चुनाव भी उन्हीं के नाम रहा. 1962 में जनसंघ के सूरज लाल वर्मा ने उमा नेहरू को हरा दिया. 1967 के चुनाव में जनसंघ ने पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी बाजपेई के सहायोगी शारदानंद दीक्षित चुनाव जीते थे.
बीते दिनों सीतापुर से बहुजन समाज पार्टी की पूर्व सांसद कैसरजहां कांग्रेस में शामिल हो गई. पूर्व सांसद कैसरजहां को बीएसपी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने की वजह से निष्कासित कर दिया था. इसी कड़ी में सपा-बसपा के गठबंधन से बसपा सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे नकुल दुबे सीतापुर में भेजे जाने की तैयारी बसपा खेमे में शुरू हो चुकी है.
ऐसे में सीतापुर का लोकसभा चुनाव निश्चित तौर पर एक बड़ा सियासी महाभारत साबित हो सकता है. वहीं कैसरजहां की गिनती पार्टी के कद्दावर लोगों में होती हैं. गौरतलब है कि सीतापुर लोकसभा सीट पर अभी भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है. बीजेपी के राजेश वर्मा ने 2014 में यहां बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार को करारी मात दी थी.
कुर्मी समुदाय का प्रभाव
इस सीट पर कुर्मी समुदाय के लोगों का प्रभाव रहा है. 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन होने से एक बार फिर यहां का मुकाबला दिलचस्प हो गया है. पिछले लोकसभा चुनाव में यहां बहुजन समाज पार्टी का दामन छोड़ भारतीय जनता पार्टी में आए राजेश वर्मा ने जीत हासिल की. उन्होंने कैसर जहां को हराया था. कैसरजहां 2009 में यहां से सांसद रह चुकी हैं. बता दें कैसरजहां पूर्व विधायक व मौजूदा नगरपालिका अध्यक्ष जासमीर अंसारी की पत्नी हैं.
कांग्रेस में कैसरजहां के आने के बाद अगर सपा- बसपा के गठबंधन से नकुल दुबे आते हैं तो भाजपा के राजेश वर्मा के लिए 2019 चुनाव की राह आसान नहीं होगी. इसको लेकर भी तमाम सवाल लोगों के जहन में हैं.
5 विधानसभा सीटें
सीतापुर में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं, जिनमें सीतापुर, लहरपुर, बिसवां, सेवता और महमूदाबाद विधानसभा सीटें हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में इनमें से सिर्फ महमूदाबाद सीट समाजवादी पार्टी के खाते में गई थी, बाकी सभी सीटें बीजेपी के पास गई थीं.