
एक ओर जहां बस्तर के अंदरूनी इलाकों में पदस्थापना को अफसर-कर्मी खुली जेल या कालापानी की सजा से कम नहीं आंकते, वहीं दूसरी ओर ग्राम धर्माराम के डाकिया गुंडी चंद्रैया 25 वर्षों से अनवरत सेवाएं दे रहे हैं। यहां कोई अफसर आना नहीं चाहता, इसलिए वही पोस्टमास्टर भी हैं। बीहड़, नदी-नाले, पहाड़ आदि होने के कारण रास्ता दुरूह होने से वे पैदल ही डाक बांटते हैं। चंद्रैया कहते हैं कि उन्होंने कभी ट्रांसफर के लिए नहीं सोचा। यहीं से रिटायर होना चाहते हैं, ताकि यहां के लोगों को कोई परेशानी न हो।
धर्माराम छत्तीसगढ़ के अंतिम छोर कहे जाने वाले पामेड़ ग्राम पंचायत के करीब बसा गांव है। इंटरस्टेट इस कॉरिडोर में नक्सलियों का जबरदस्त दबदबा है। धर्माराम और इससे सटे 40 गांवों में लोकतंत्र नहीं बल्कि लालतंत्र का बोलबाला है।
समूचा इलाका माओवाद ग्रस्त है, इस वजह से यहां बिजली, सड़क, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का अभाव है। ऐसे दुर्गम इलाके में रहकर ईमानदारी से ड्यूटी करना किसी चुनौती से कम नहीं है। बावजूद इसके चंद्रैया उन अफसर-कर्मियों के मुंह पर करारा तमाचा हैं, जो विपरीत परिस्थितियों से डरकर ड्यूटी से बचते हैं।
रोजाना पैदल चलते हैं 15 से 20 किमी
धर्माराम पहाड़ व जंगल से घिरा हुआ गांव है। यहां की बसाहट के बीच गुंडी चंद्रैया की एक कुटिया है, जिसके एक छोटे से कमरे में वर्ष 1996 से उप डाकघर का संचालन हो रहा है। चंद्रैया की माने तो पोस्टमास्टर की पदस्थापना के बावजूद कुछ समय बाद उन्हें ही डाकवाहक के साथ-साथ पोस्टमास्टर की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी।
पोस्टमास्टर टिके ही नहीं। करीब दो दशक से वे अकेले ही सेवा दे रहे हैं। इस उप डाकघर के दायरे में करीब तीन दर्जन गांव आते हैं। इनमें कई गांव ऐसे हैं, जहां दुपहिया से पहुंच पाना संभव नहीं। ऐसे में वे पैदल ही डाक बांटते हैं। इसके लिए उन्हें रोजाना करीब 15 से 20 किलोमीटर तय करना पड़ता है। चंद्रैया कहते हैं कि मौसम कोई भी हो, वे कर्तव्य से पीछे नहीं हटते।
अब बेटे से भी ले लेते हैं मदद
गुंडी चंद्रैया बताते हैं कि उन्होंने तीन सौ रुपए महीने की पगार पर ड्यूटी शुरू की थी। आज उन्हें 15 हजार रुपए तनख्वाह मिलती है। वे कहते हैं कि शहर में तो पर्व-त्योहारों के मौके पर डाकियों को बख्शीश भी मिल जाती है, लेकिन यहां तो गरीब आदिवासी हैं, जिन्हें वे खुद मौके-बे मौके मदद करते हैं। उम्रदराज चंद्रैया कहते हैं कि बेटा अब थोड़ा बड़ा हो गया है। डाक बांटने में अब उससे भी मदद मिल जाती है।
चिठ्ठियां नहीं, लेकिन जरूरी कागजात
चंद्रैया बताते हैं कि सोशल मीडिया का दौर है। ऐसे में पारिवारिक चिठ्ठियां नहीं के बराबर आती हैं। डाक में आधार कार्ड, पैन कार्ड, आश्रम-स्कूलों के सरकारी पत्र, शादी कार्ड, जरूरी कागजात आदि ही शामिल होते हैं। इन्हें संबंधितों तक समय पर पहुंचाना आवश्यक होता है