भाजपा को हिन्दू समाज ने हराया

बहुत ही कम मुस्लिम आबादी वाले राज्य हैं मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़

भाजपा ने केंद्र की सत्ता में आने से पहले देश की एक अरब से ज्यादा आबादी वाले हिन्दू समाज में अति अपेक्षायें पैदा कर दी थीं। धर्म की आफीम का नशा और विकास के वादे की उम्मीदों का कॉकटेल बहुसंख्यक समाज की मदहोशी बढ़ाता गया। इस तरह देशभर में भाजपा का जनाधार तेजी से बढ़ा। केंद्र की हुकूमत की नेमत देने के बाद जनता भाजपा को राज्यों की सत्ता की चाबी देती रही। नरेंद्र मोदी सरकार के पांचवे साल का नीबू पानी मदहोशी को होश में लाने लगा है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो गया होता तो आर्थिक मंदी से लेकर बढ़ती मंहगाई और बेरोजगारी भी बर्दाश्त कर ली जाती। किन्तु ना माया मिली ना राम। नोटबंदी से लेकर अनआर्गनाइज तरीके से लागू की गयी जीएसटी ने तकलीफों के सिवा कुछ नहीं दिया। सत्ता के साढ़े चार वर्ष गुजरने के बाद राम मंदिर के निर्माण के लिए कोई ठोस कदम उठाने के बजाय सिर्फ मंदिर की सियासत को गरमाने की कोशिशें की गयीं। नतीजतन धर्म संसद जैसे आयोजनों से गैर राजनीतिक आम हिन्दू समाज दूर रहा। और इस तरह के प्रायोजित कार्यक्रम फ्लाप साबित हुए।
इसी दौरान लोकसभा चुनाव के सेमीफाइनल कहे जाने वाले पांच राज्यों के चुनावों में ये साबित हो गया कि एक बार फिर हिन्दू समाज ने भाजपा पर से भरोसा खोना शुरू कर दिया है।

मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ऐसे राज्य हैं जहां देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा मुस्लिम आबादी बहुत कम है। इन राज्यों की कुल आबादी में दस प्रतिशत भी मुस्लिम आबादी नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी और हिन्दुत्व के फायर ब्रांड योगी आदित्यनाथ योगी की धुंआधार रैलियों के बावजूद पांच राज्यों में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी।
गौरतलब है कि भाजपा को हमेशा ध्रुवीकरण का माहौल चुनाव में सफलता दिलाता रहा है। पिछले एक महीने के दौरान अयोध्या मुद्दा गरमाने की भरपूर कोशिशे हुईं। अयोध्या और दिल्ली में धर्म संसद के आयोजनों से ध्रुवीकरण का माहौल पैदा करने की खूब कोशिशें हुयीं। इस दौरान ही पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। अनुमान लगाया जा रहा था कि हिन्दू बाहुल्य राज्यों खासकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक का गढ़ कहे जाने वाले मध्य प्रदेश के चुनावी नतीजों में हिन्दुत्व के रंगों का असर जरूर दिखेगा। लेकिन इसके विपरीत इन राज्यों में फायदे के बजाय भाजपा को अपने पुराने जनाधार से भी हाथ धोना पड़ा।

समाजशास्त्रियों और राजनीति विश्लेषकों की माने तो हिन्दू समाज में धर्म को लेकर कट्टरता की भावना बेहद कम है। देश के बहुसंख्यक समाज ने विकास की अपेक्षाओं के साथ भाजपा को आजमाया था।

बताया जाता है कि भाजपा कि आंतरिक सर्वे रिपोर्ट में ये बात सामने आयी थी कि नरेंद्र मोदी को विकास का चेहरा माना गया था नाकि हिन्दुत्व का। भ्रष्टाचार मुक्त भारत की कल्पना के साथ मंहगाई पर लगाम और रोजगार सृजित करना भाजपा का मुख्य मुद्दा था। किन्तु भाजपा की सरकारें अपने वादे पर बीस प्रतिशत भी खरी नहीं उतर सकीं। यहां तक कि हिन्दुत्व की अलख जलाने का अप्रत्यक्ष वादा भी धरे का धरा रह गया। अयोध्या में राम मंदिर मामले को न्यायालय के फैसले पर छोड़ दिया।सत्तारूढ़ भाजपा कहती रही कि इस मसले का हल न्यायालय से ही निकल सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर निर्माण के लिए संसद में कानून पास कराने का बिल पेश करने की कोशिश के बजाय कोर्ट के फैसले के इंतजार को ही उचित समझा।श्री मोदी ने देश-दुनिया में सैकड़ों यात्रायें की पर राम लला के दर्शन के लिए वो अयोध्या एक बार भी नहीं पंहुचे। मजारों और मजलिसों में शिरकत करने वाले नरेंद्र मोदी की नीतियों और कांग्रेस की नीतियों में क्या अंतर है ! हिन्दुत्व को बढ़ावा देने के पक्ष वाला हिन्दू समाज का कट्टरवादी तबका भी अब ये सवाल करने लगा है कि हम देश को कांग्रेस मुक्त बनाने में भाजपा का साथ क्यों दें ! हिन्दुत्व के एजेंडे पर भाजपा और कांग्रेस में फर्क ही क्या है ! कांग्रेस भी अयोध्या मसले को कोर्ट के फैसले पर छोड़ चुकी है और भाजपा भी यही कहती है। आरक्षण और एससी-एसटी कानून को बहाल करना भाजपा सरकार को और भी मंहगा पड़ा।भाजपा का पारंपारिक वोट बैंक स्वर्ण बुरी तरह नाराज हो गया दलितों-पिछड़ों ने भी घर वापसी (सपा-बसपा इत्यादि में) करना शुरू कर दी।
अब सोशल मीडिया पर तमाम भाजपा समर्थकों का बदला हुआ रुख कह रहा है कि भाजपा को हमने बहुमत की सरकारें बड़ी उम्मीदों से दी थीं। किन्तु हमे ना माया (रोजगार ना मिलना/महंगाई कम ना होना) मिली ना राम।

-नवेद शिकोह
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