
देहरादून, (मनमोहन भट्ट): उत्तराखंड में पानी की किल्लत लगातार बढ़ती जा रही है. पिछले 5 साल में राज्य के 10,000 से ज्यादा पानी के स्रोत सूखते हुए नजर आए हैं. ऐसे में जन-जन तक पानी पहुंचाना बड़ी समस्या बनती जा रही है. पिछले 5 साल में राज्य मे ढाई हजार नई पानी की योजनाएं बनाई गई, लेकिन पुरानी योजनाओं में पानी कम होने से संकट लगातार बरकरार है.
पहाड़ों में पानी के स्रोतों के सूखने की कहानी कोई नई नहीं है. कई साल से इन स्रोतों के सूखने पर चिंता जाहिर की गई. लेकिन अब योजना आयोग की एक विस्तृत अध्ययन के बाद ये पता चला है कि 10,000 से ज्यादा ऐसे स्रोत सूख गए जिनसे पूरे राज्य में पानी की सप्लाई की जाती है. उत्तराखंड में बहने वाली नदियों में पानी या तो हिमालय से पिघलने वाली बर्फ के जरिए आता है या फिर बारिश से. बरसात के दिनों में तमाम पानी के स्रोत रिचार्ज हो जाते हैं.
उत्तराखंड की नदियों में पानी को फिर से बढ़ाने के लिए अब एक बार प्रयास शुरू हुए हैं. चाहे वह देहरादून की रिस्पना और बिंदाल नदी की बात हो या फिर अल्मोड़ा की कोसी नदी की. इन नदियों में जलस्तर बढ़ाने के लिए योजनाएं बन्नी शुरू हो चुकी है. राजधानी देहरादून में ही पानी की किल्लत से छुटकारा दिलाने के लिए सोंग नदी पर बांध बनाने की योजना है. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का कहना है कि राज्य बनने के बाद देहरादून में आबादी बहुत तेजी से बढ़ी है. कई बार पानी की समस्या से भी राजधानी के लोगों को जूझना पड़ता है. लेकिन अगर सोंग नदी पर बांध बन जाएगा तो पानी की समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी.
शहरी क्षेत्रों में घरों, व्यवसायिक भवनों में निर्माण के साथ-साथ अंडर ग्राउंड टैंक बनाए जाने का प्रावधान भी किया गया. इन में बरसात का पानी इकट्ठा हो सकता है. लेकिन इसे बहुत गंभीरता से लागू नहीं किया गया. अब देखना यह है कि जिन नदियों को बचाए जाने के प्रयास हो रहे हैं क्या वाकई उन में सफलता मिल पाती है या नहीं.