पोलिटिकल पंच कार्ड.. माया, अखिलेश औऱ कांग्रेस

लखनऊ। NKB:- निःसन्देह अखिलेश व्यक्तिगत रूप से दल का नेतृत्व करते रहे तो बहुत आगे तक जा सकते हैं। पहले भी विकास को लेकर उनके आसपास के लोगो ने टांग न खींची होती तो बहुत कुछ हो गया होता। शुरुआती कुछ निर्णयों की बात नही करूँगा क्योंकि राजनीति में नया कदम था पर बाद के काल मे अपनी योग्यता और दक्षता का जो परिचय उन्होंने दिया वह प्रशंसनीय है।पोलिटिकल पंच कार्ड.. माया, अखिलेश औऱ कांग्रेस

इसी प्रकार योगी जी पूरी ताकत, ऊर्जा, ईमानदारी व लग्न के साथ प्रदेश को अच्छे स्तर पर लाने के लिए लगे हुए है। पर्यटन हो चाहे ओद्योगिक परियोजनाओं का शुभारंभ, इन्होंने विकास की प्राण वायु प्रदेश में फूंकी है जिसका परिणाम बहुत जल्द सामने होगा।

मनमोहन जी और राजीव जी दोनों ही योग्य थे इस बात पर जरा भी शक नही। आधार हो याफिर कुछ और उनके ही दिमाग की उपज थी। अब यह मैं नही कह सकता कि मुक्त होकर मनमोहन जी काम कर नही पाए या उन्हें करने नही दिया गया पर जितना समय उन्हें मिला इस दौरान बहुत कुछ हो सकता था। राहुल जी की कमजोर हिंदी को लेकर मजाक कितना भी बनाया जाय चाहे पप्पू ही क्यों न कहा जाय पर इधर कुछ दिनों में राहुल जी मे जो गंभीरता देखने को मिली है वह पहले कभी नही मिली। यह बहुत अच्छी बात है और भविष्य के लिए सकरात्मक सूचक है।

बहन जी के समय मे अनुशासन अपने चरम पर था। वो स्वतः क्या करती थी मैं उसकी बात नही कर रहा हूँ पर अधीनस्थ किसी की क्या मजाल जो अनुशासनहीनता और स्वच्छन्दता में कदम भी रख दे। अनुशासन बहुत अच्छा बनाये रखा।

मुझे किसी भी एक दल से कोई लेना देना नही है यह बात आपसभी जानते है। मेरा विरोध दल अथवा व्यक्ति से कभी नही रहता बल्कि अलोकप्रियता से रहता है जो मेरे पैमाने पर मुझे मेरे अनुसार खरी नही दिखती। यही कारण है कि मेरी वाल देखकर कोई नही बता सकता कि मैं किस दल या व्यक्ति का समर्थन करता हूँ अथवा किस दल या व्यक्ति का विरोध। मैंने दल और व्यक्ति विरोध कभी किया ही नही। यदि कभी ऐसा हुआ तो शायद तब होगा जब किसी के सारे कारनामे उसके प्रति अलोकप्रियता का स्थायी गुल खिला देंगे।

सभी दल सबकुछ बुरा नही करते क्योंकि उन्हें जनता को जवाब देना होता है पर जो कुछ भी वे अच्छा करते है उसे अन्य खामियों के चलते लोग भूल जाते है यह दुःख का विषय अवश्य है। लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारे छाती ठोंक कर चुनाव जीत कर आती है इसलिए सरकारो का विरोध तो होना ही नही चाहिए बल्कि उनकी कुछ अलोकप्रिय नीतियां लोकचर्चा में अवश्य शामिल की जानी चाहिए।

जब किसी व्यक्ति द्वारा पारित समस्त विचार अथवा उसके अधिकतर विचार ही असंतुलित हो जाते है तभी व्यक्ति विशेष का विरोध होता है अन्यथा वोट देने वाला जीत कर आये व्यक्ति का विरोध कभी नही करता यहां सभी दलों के अपने अपने भक्तों की बात नही कर रहा हूँ क्योंकि उन्हें भक्त बनाने में शोशल मीडिया का बहुत बड़ा योगदान हो सकता है।

एक समय था जब लोगो के अंदर विचार मंच पर चढ़कर पैदा किये जाते थे पर आज यह कार्य ७०% शोशल मीडिया कर देता है, कमी रहती है तो चुनाव के समय जनता के बीच जाकर दुनिया धरती में आपकी उपस्थिति दिखाने और जनता ने जो शोशल मीडिया में देखा है उसके प्रति सम्भवनाये दिखाने की। इसकारण चुनाव पूर्व बड़ी बड़ी रैलियां आयोजित कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जाती है।

आज का दौर कहता है कि जिस दल का आई0टी0 सेल जितना बड़ा और जबरजस्त होगा, यकीन मानिए उसके पक्ष में लहर आने की सम्भवना उतनी ही अधिक होगी।