बिहार में शिक्षा माफिया पर हमलावर रहे राज्यपाल सत्यपाल मलिक, बेबाकी भी रही पहचान

पटना। छात्र आंदोलन से राजनीति में प्रवेश कर राज्यपाल तक का सफर तय करने वाले सत्यपाल मलिक की पहचान एक बेबाक बोलने वाले राजनेता और शिक्षा सुधार के लिए कटिबद्ध व्यक्ति की है। बिहार में उन्हें ज्यादा वक्त बिताने का मौका तो नहीं मिला, लेकिन महज दस महीने में उन्होंने शिक्षा में सुधार और शिक्षा गुणवत्ता के लिए जो कदम उठाए उसकी सराहना प्रदेश के शिक्षाविद् से लेकर अभिभावक तक करते हैं। 

मलिक को मानो इस बात का एहसास था कि बिहार में उनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं होगा, नतीजा उन्होंने बिहार के राज्यपाल के साथ ही चांसलर पद का जिम्मा संभालते ही अपनी कार्यशैली से यह बता दिया कि बिहार की बदनाम शिक्षा व्यवस्था को वह पटरी पर लाकर ही दम लेंगे।  सत्यपाल मलिक को बिहार के राज्यपाल की बागडोर चार अक्टूबर को मिली थी। पद संभालने के महज चंद दिनों के भीतर ही उन्होंने छात्र संघ के चुनाव को एलान किया। बता दें कि बिहार में छात्र संघ के चुनाव अंतिम बार 2012 में हुए थे। वह भी सिर्फ एशिया के ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले पटना विश्वविद्यालय में। मलिक ने घोषणा की कि छात्र संघ के चुनाव एक साथ सभी विश्वविद्यालयों में कराए जाएंगे। 

इसके बाद मलिक ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मलिक ने विवि के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम लागू करने की परिकल्पना को साकार करने का फैसला किया। छात्रों को इस योजना के प्रभावी होने से दो वर्ष के पाठ्यक्रम को बीच में बदलने की सहूलियत मिलती। आदेश को लागू करने की कवायद शुरू हुई और अब मेहनत रंग ला रही है। च्वाइस बेस्ड क्रेडिट कोर्स को प्रभावी करने की पूरी कार्य योजना तैयार हो गई और चालू शैक्षणिक सत्र से यह योजना प्रभावी भी हो जाएगी। 

विश्वविद्यालयों में पढऩे वाली छात्राओं की सुरक्षा और सहूलियत के लिए भी मलिक काफी सक्रिय रहे। एक सार्वजनिक सभा में मलिक ने यह कह कर विवाद खड़ा कर दिया कि यदि प्रदेश के किसी भी कोने में किसी लड़की-महिला को कोई समस्या होती है तो पुलिस को फोन करने के पहले पीडि़त लड़की या महिला पहला फोन राजभवन को करे। राजभवन का प्रशासनिक अमला उस लड़की की मदद को तत्काल पहुंचेगा। बहरहाल मलिक रुके नहीं। उन्होंने जो गति निर्धारित की उस पर बढ़ते गए।

उन्होंने आदेश पारित किया कि जिस कॉलेज में छात्राओं के लिए अलग कॉमन रूम और शौचालय नहीं होंगे तो वैसे कॉलेज को मान्यता नहीं दी जाएगी। फैसला बड़ा था। संशय भी था, लेकिन आदेश का असर हुआ और लगभग अधिकांश कॉलेजों ने इस पर कवायद प्रारंभ कर दी है। शिक्षा सुधार के प्रयासों में जुटे मलिक ने बीएड कॉलेजों को भी अपने निशाने पर लिया। मलिक ने फैसला किया कि बिहार के बीएड कॉलेज में नामांकन अब सामान्य पद्धति से पैसा देकर नहीं होगा। बल्कि कॉमन इंटे्रंस टेस्ट के माध्यम से बीएड कॉलेजों में नामांकन संभव हो पाएगा। उनके फैसले का असर रहा कि बिहार में पहली बार बीएड में नामांकन के लिए कॉमन इंट्रेंस टेस्ट हुए और तकरीबन 90 हजार छात्र-छात्राओं ने यह परीक्षा दी। 

कॉलेजों में शिक्षक और छात्र की उपस्थिति बड़ा मसला रहा है। मलिक ने इसमें सुधार के लिए विवि और कॉलेजों में बायोमीट्रिक हाजिरी की व्यवस्था लागू करने के आदेश दिए, ताकि शिक्षक छात्र की उपस्थिति का आकलन हो सके। यह योजना भी प्रभावी होने लगी है।विश्वविद्यालयों में शिक्षा सुधार के लिए क्या हो रहे इसकी मॉनीटङ्क्षरग के लिए कुलाधिपति ने पहली बार सभी कुलपतियों की मासिक बैठक की व्यवस्था बनाई। जो नियमित रूप से प्रत्येक महीने हुई। इन बैठकों में शिक्षा सुधार के लिए कई अहम फैसले लिए गए।

विश्वविद्यालयों, कॉलेजों के सेवांत लाभ से जुड़े मामलों या इस प्रकार की दूसरी शिकायतों की बढ़ती संख्या को देखते हुए चांसलर ने कुलपतियों को सप्ताह में एक दिन शैक्षणिक कार्यों से समय निकाल लोगों की शिकायत सुनने का दायित्व सौंपा। यह योजना भी इसी महीने से प्रभावी हुई है।  मलिक ने विवि और कॉलेजों में पढ़ाई पर नजर रखने के लिए प्रत्येक कक्षा में सीसीटीवी लगाने के निर्देश दिए हैं।

सीसीटीवी की मॉनीटरिंग के लिए राजभवन में कंट्रोल रूम बनाने की भी बात है। इस योजना पर काम शुरू हो गया है। संभावना है अक्टूबर तक यह योजना प्रभावी हो जाएगी। बहरहाल दस महीने के बिहार के अपने कार्यकाल में मलिक सबके के लिए सहज सुलभ रहे। बड़े फैसले लेते रहे। शिक्षा माफिया के खिलाफ हमलावार रहे। उनके कार्यों को बिहार हमेशा याद रखेगा।