
प्राइवेट सेक्टर के प्रोफेनल्स को संयुक्त सचिव स्तर के पदों नियुक्त करने के लिए सरकार द्वारा आवेदन मंगाने की अंतिम तारीख सोमवार को खत्म हो गई. लेकिन इन पदों के लिए किए गए आवेदन अपेक्षा से कम थे. कुल आवेदनों की संख्या 6000 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई.
कार्मिक मंत्रालय (डीएपीटी) के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि उनके पास अपेक्षा से कम आवेदन आए. उन्होंने कहा कि हमें एक लाख आवेदन आने की उम्मीद थी. बता दें कि प्राइवेट सेक्टर के प्रोफेशनल्स के लिए ब्यूरोक्रेसी के दरवाज़े खोलते हुए 10 जून को सरकार ने संयुक्त सचिव स्तर के पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे थे. सरकार का तर्क था किसी खास क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाले लोगों को ब्यूरोक्रेसी में लाने से उनके अनुभवों लाभ लिया जा सकेगा.
डोओपीटी द्वारा नोटीफिकेशन में कहा गया था कि सरकार राष्ट्र निर्माण में प्रतिभाशाली लोगों का सहयोग चाहती है. सरकार ने प्राइवेट सेक्टर के लोगों को सरकार में शामिल करने का फैसला नीति आयोग के सुझाव के बाद लिया. आयोग द्वारा सिविल सर्विसेज़ रिफॉर्म पर ड्राफ्ट एजेंडा में कहा गया, ‘आजकल अर्थव्यवस्था की बढ़ती हुई जटिलता विशेषज्ञता की मांग करती है. इसलिए ज़रूरी हो जाता है कि किसी क्षेत्र विशेष के स्पेशलिस्ट लोगों को लैटरल एंट्री के माध्यम से सिस्टम में शामिल किया जाए. ऐसा करने से आईएएस अधिकारियों के अंदर एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा का भाव भी पैदा होगा.
दरअसल सरकार में संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी नीति निर्माण और उसे लागू करवाने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं. वे सीधा सचिव या अतिरिक्त सचिव को रिपोर्ट करते हैं. संयुक्त सचिव स्तर का पद अभी तक यूपीएससी द्वारा करवाई गई परीक्षा के माध्यम से भरा जाता है.
नोटिफिकेशन के अनुसार राज्य सरकार और केंद्र या राज्य पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग के अधिकारी इस पद के लिए प्रतिनियुक्ति पर होंगे, जबकि प्राइवेट सेक्टर के प्रोफेशनल्स को कॉन्ट्रेक्ट पर रखा जाएगा. इस पद पर नियुक्त किए जाने वाले लोगों को अपने-अपने क्षेत्र में कम से कम 15 सालों का अनुभव होना चाहिए. इन्हें तीन से पांच साल के लिए नियुक्त किया जाएगा.
प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद को बताया कि ‘लैटरल एंट्री’ का प्रोविज़न इसलिए किया गया ताकि गवर्नेंस में नए विचारों को लाया जा सके. हालांकि उन्होंने ये कहा कि इससे ये नहीं समझना चाहिए कि मौजूदा ब्यूरोक्रेसी सक्षम नहीं है. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तत्कालीन योजना आयोग उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का उदाहरण दिया जो कि लैटरल एंट्री के माध्यम से कई पदों पर रहे. हालांकि इन गिने-चुने उदाहरणों के अलावा सरकार बड़े स्तर पर यूपीएससी द्वार चुने हुए ब्यूरोक्रेट्स को ही इन पदों पर नियुक्त करती रही है.