
किसान आंदोलन को अब ट्रेड यूनियनों का भी साथ मिलता जा रहा है। भारतीय इस्पात प्राधिकरण-सेल की सबसे बड़ी इकाई भिलाई इस्पात संयंत्र के श्रमिक संगठनों ने भी सरकार की नीतियों पर नाराजगी जाहिर की है। लंबित वेतन समझौता, सुविधाओं में कटौती से नाराज चल रहे कर्मचारियों का गुस्सा अब और बढ़ चुका है।

माकपा, भाकपा, भाकपा (माले लिबरेशन), सीटू, एटक, एक्टू एसएफआई, जमस, लोईमु, हम भारत के लोग मंच, भारत बचाओ संविधान बचाओ समिति, बौद्ध महासभा, करबला समिति, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा कार्यकर्ता समिति आदि संगठनों ने भी नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
सेवानिवृत्त कर्मचारी संघ के अध्यक्ष एवं मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव शांत कुमार ने कहा कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में जिन बातों को लिखा, अब सरकार बनने के बाद वह भूल चुकी है। पिछले छह साल से इन सारी बातों से अलग हटकर प्रधानमंत्री मन की बात कर लोगों को मात्र बहला रहे हैं।
सीटू के संगठन सचिव डीवीएस रेड्डी का कहना है पिछले कुछ समय से यह बात तेजी से सामने आ रही है कि मेहनतकश वर्ग चाहे वह किसान हो या मजदूर हो। जैसे ही अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने लगते हैं। सरकार उन्हें वामपंथी करार दे देती है। किसी भी संगठन से जुड़ा हुआ मजदूर या किसान आंदोलन करता है तो वह सही मायने में वामपंथी ही होता है, क्योंकि वामपंथी सोच ही इंसान का इंसान के द्वारा किया जाने वाले शोषण के खिलाफ और शोषण विहीन समाज के निर्माण का पक्षधर रहा है। और यह काम केवल और केवल मजदूर-किसानों का गठजोड़ ही कर सकता है।
आय दोगुनी कैसे होगी बताए सरकार
पूर्व मान्यता प्राप्त यूनियन सीटू के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक खातरकर ने कहा कि केंद्र सरकार ने 2022 तक किसानों की आय को दोगनी करने की बात कही थी। किंतु सरकार जिन बिलो को लाकर किसानों पर थोपा है, उससे किसानों की आय दोगनी होना तो दूर की बात है। उल्टा किसानों को होने वाले सामान्य आय से भी उन्हें हाथ धोना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में सरकार स्पष्ट करें कि किसानों की आय दोगुनी कैसे होने वाली है।